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Rigveda Mandal 2 / Sukta 40 / Mantra 5

43 Sukta
6 Mantra
2/40/5
Devata- सोमापूषणावदितिश्च Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वा॑न्य॒न्यो भुव॑ना ज॒जान॒ विश्व॑म॒न्यो अ॑भि॒चक्षा॑ण एति। सोमा॑पूषणा॒वव॑तं॒ धियं॑ मे यु॒वाभ्यां॒ विश्वाः॒ पृत॑ना जयेम॥

विश्वा॑नि । अ॒न्यः । भु॒व॒ना । ज॒जान॑ । विश्व॑म् । अ॒न्यः । अ॒भि॒ऽचक्षा॑णः । ए॒ति॒ । सोमा॑पूषणौ । अव॑तम् । धिय॑म् । मे॒ । यु॒वाभ्या॑म् । विश्वाः॑ । पृत॑नाः । ज॒ये॒म॒ ॥

Mantra without Swara
विश्वान्यन्यो भुवना जजान विश्वमन्यो अभिचक्षाण एति। सोमापूषणाववतं धियं मे युवाभ्यां विश्वाः पृतना जयेम॥

विश्वानि। अन्यः। भुवना। जजान। विश्वम्। अन्यः। अभिऽचक्षाणः। एति। सोमापूषणौ। अवतम्। धियम्। मे। युवाभ्याम्। विश्वाः। पृतनाः। जयेम॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे अध्यापक और उपदेशको ! जो (अन्यः) भिन्न भाग (विश्वानि) समस्त (भुवना) लोकों में प्रसिद्ध पदार्थों को (जजान) उत्पन्न करता जो (अन्यः) और (अभिचक्षाणः) प्रकट वाणी का विषय (विश्वम्) संसार को (एति) प्राप्त होता उन दोनों (सोमापूषणौ) शान्ति और पुष्टि गुणवाले वायु का उपदेश देकर (मे) मेरी (धियम्) बुद्धि की तुम दोनों (अवतम्) रक्षा करो जिससे (युवाभ्याम्) तुम दोनों के साथ हम लोग (विश्वाः) समस्त (पृतनाः) मनुष्यों को (जयेम) उत्कर्ष दें ॥५॥
Essence
जो वायु सब लोकों को धरता और जो शब्द प्रयोग वा श्रवण का निमित्त है, उसके विज्ञान कराने से सब मनुष्यों की उन्नति करनी चाहिये ॥५॥
Subject
अब विद्वानों के गुणों को कहते हैं ।