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Rigveda Mandal 2 / Sukta 4 / Mantra 9

43 Sukta
9 Mantra
2/4/9
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वया॒ यथा॑ गृत्सम॒दासो॑ अग्ने॒ गुहा॑ व॒न्वन्त॒ उप॑राँ अ॒भि ष्युः। सु॒वीरा॑सो अभिमाति॒षाहः॒ स्मत्सू॒रिभ्यो॑ गृण॒ते तद्वयो॑ धाः॥

त्वया॑ । यथा॑ । गृ॒त्स॒ऽम॒दासः॑ । अ॒ग्ने॒ । गुहा॑ । व॒न्वन्तः॑ । उप॑रान् । अ॒भि । स्युरिति॒ स्युः । सु॒ऽवीरा॑सः । अ॒भि॒मा॒ति॒ऽसहः॑ । स्मत् । सू॒रिऽभ्यः॑ । गृ॒ण॒ते । तत् । वयः॑ । धाः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वया यथा गृत्समदासो अग्ने गुहा वन्वन्त उपराँ अभि ष्युः। सुवीरासो अभिमातिषाहः स्मत्सूरिभ्यो गृणते तद्वयो धाः॥

त्वया। यथा। गृत्सऽमदासः। अग्ने। गुहा। वन्वन्तः। उपरान्। अभि। स्युरिति स्युः। सुऽवीरासः। अभिमातिऽसहः। स्मत्। सूरिऽभ्यः। गृणते। तत्। वयः। धाः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान विद्वान् ! (यथा) जैसे (त्वया) आपके साथ वर्त्तमान (गृत्समदासः) और जिनका बुद्धिमानों के आनन्द के समान आनन्द है वे (गुहा) बुद्धि में (वन्वन्तः) सब प्रकार के पदार्थों का विभाग करते हुए (सुवीरासः) उत्तम वीरों से युक्त जन (सूरिभ्यः) विद्वानों से विद्याओं को प्राप्त होकर (उपरान्) मेघों को सूर्य के समान (अभिमातिसाहः) अभिमान करने और शत्रुजनों को सहनेवाले (अभिष्युः) सब ओर से हों वैसे जो (तत्) उसे (वयः) काम को (धाः) धारण करता है उसकी जो (गृणते) स्तुति करते हैं उनके साथ (स्मत्) ही हम लोग ऐसे हों ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे प्राप्त विद्वानों से विद्या और शिक्षा ग्रहण कर आनन्दित विजयमान और वीरपुरुषों से युक्त प्रशंसनीय जन होते हैं, वैसे अग्निविद्या से युक्त पुरुष अन्धकार को जैसे सूर्य वैसे दुःख का विनाश करते हैं ॥९॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह दूसरे मण्डल में चौथा सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।