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Rigveda Mandal 2 / Sukta 4 / Mantra 6

43 Sukta
9 Mantra
2/4/6
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- आर्षीपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ यो वना॑ तातृषा॒णो न भाति॒ वार्ण प॒था रथ्ये॑व स्वानीत्। कृ॒ष्णाध्वा॒ तपू॑ र॒ण्वश्चि॑केत॒ द्यौरि॑व॒ स्मय॑मानो॒ नभो॑भिः॥

आ । यः । वना॑ । त॒तृ॒षा॒णः । न । भाति॑ । वाः । न । प॒था । रथ्या॑ऽइव । स्वा॒नी॒त् । कृ॒ष्णऽअ॑ध्वा । तपुः॑ । र॒ण्वः । चि॒के॒त॒ । द्यौःऽइ॑व । स्मय॑मानः । नभः॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
आ यो वना तातृषाणो न भाति वार्ण पथा रथ्येव स्वानीत्। कृष्णाध्वा तपू रण्वश्चिकेत द्यौरिव स्मयमानो नभोभिः॥

आ। यः। वना। ततृषाणः। न। भाति। वाः। न। पथा। रथ्याऽइव। स्वानीत्। कृष्णऽअध्वा। तपुः। रण्वः। चिकेत। द्यौःऽइव। स्मयमानः। नभःऽभिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 25 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (वना) वन और जलों के प्रति (ततृषाणः) निरन्तर पिआसे के (न) समान (आ भाति) अच्छे प्रकार प्रकाशित होता है और (पथा) मार्ग से (वाः) जल के (न) समान तथा (रथ्येव) रथ आदि के लिये जो हित है उस मार्ग अर्थात् सड़क के समान (स्वानीत्) शब्दायमान होता है जो (कृष्णाध्वा) काले वर्णयुक्त (तपुः) सब ओर से तपानेवाला (रण्वः) रमणीय (स्मयमानः) कुछ मुस्कातासा हुआ (द्यौरिव) सूर्य के प्रकाश के समान (नभोभिः) अन्नादि पदार्थों से (चिकेत) उद्बोध को प्राप्त हो अर्थात् प्रज्वलित हो वह विद्वानों ही को जानने योग्य है ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कोई अतितृषायुक्त कहनेवाला जन हँसता हुआ कहे कि जल मार्ग में जाता है, वैसे वनस्थ अग्नि बहुत शब्दायमान होता है ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।