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Rigveda Mandal 2 / Sukta 4 / Mantra 3

43 Sukta
9 Mantra
2/4/3
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- आर्षीपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒ग्निं दे॒वासो॒ मानु॑षीषु वि॒क्षु प्रि॒यं धुः॑ क्षे॒ष्यन्तो॒ न मि॒त्रम्। स दी॑दयदुश॒तीरूर्म्या॒ आ द॒क्षाय्यो॒ यो दास्व॑ते॒ दम॒ आ॥

अ॒ग्निम् । दे॒वासः॑ । मानु॑षीषु । वि॒क्षु । प्रि॒यम् । धुः॒ । क्षे॒ष्यन्तः॑ । न । मि॒त्रम् । सः । दी॒द॒य॒त् । उ॒श॒तीः । ऊर्म्याः॑ । आ । द॒क्षाय्यः॑ । यः । दास्व॑ते । दमे॑ । आ ॥

Mantra without Swara
अग्निं देवासो मानुषीषु विक्षु प्रियं धुः क्षेष्यन्तो न मित्रम्। स दीदयदुशतीरूर्म्या आ दक्षाय्यो यो दास्वते दम आ॥

अग्निम्। देवासः। मानुषीषु। विक्षु। प्रियम्। धुः। क्षेष्यन्तः। न। मित्रम्। सः। दीदयत्। उशतीः। ऊर्म्याः। आ। दक्षाय्यः। यः। दास्वते। दमे। आ॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जिस (अग्निम्) अग्नि को (मानुषीषु) मनुष्य सम्बन्धी (विक्षु) प्रजाजनों में (क्षेष्यन्तः) निवास करते हुए (देवासः) विद्वान् जन (प्रियम्) प्रिय मनोहर (मित्रम्) मित्र के (न) समान (आधुः) अच्छे प्रकार स्थापन करें (यः) जो (दक्षाय्यः) सब पदार्थों को छिन्न-भिन्न करनेवाला अग्नि (दमे) कलाघर में (दास्वते) दानशील जन के लिये (उशतीः) मनोहर (ऊर्म्याः) रात्रियों को (आ, दीदयत्) प्रज्वलित करता प्रकाशित करता है (सः) वह सबको संप्रयुक्त करना चाहिये अर्थात् वह कलाघरों में युक्त करना चाहिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अग्नि मित्र के समान सुख देता और सब प्रजाजनों में प्रदीपसमान सब वस्तुओं को प्रकाशित करता है, उसका विद्वानों को अपने कामों में अनुकूल योग करना चाहिये ॥३॥
Subject
फिर अग्नि-कार्यों से विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।