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Rigveda Mandal 2 / Sukta 4 / Mantra 1

43 Sukta
9 Mantra
2/4/1
Devata- अग्निः Rishi- सोमाहुतिर्भार्गवः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
हु॒वे वः॑ सु॒द्योत्मा॑नं सुवृ॒क्तिं वि॒शाम॒ग्निमति॑थिं सुप्र॒यस॑म्। मि॒त्रइ॑व॒ यो दि॑धि॒षाय्यो॒ भूद्दे॒व आदे॑वे॒ जने॑ जा॒तवे॑दाः॥

हु॒वे । वः॒ । सु॒ऽद्योत्मा॑नम् । सु॒ऽवृ॒क्तिम् । वि॒शाम् । अ॒ग्निम् । अति॑थिम् । सु॒ऽप्र॒यस॑म् । मि॒त्रःऽइ॑व । यः । दि॒धि॒षाय्यः॑ । भूत् । दे॒वः । आऽदे॑वे । जने॑ । जा॒तऽवे॑दाः ॥

Mantra without Swara
हुवे वः सुद्योत्मानं सुवृक्तिं विशामग्निमतिथिं सुप्रयसम्। मित्रइव यो दिधिषाय्यो भूद्देव आदेवे जने जातवेदाः॥

हुवे। वः। सुऽद्योत्मानम्। सुऽवृक्तिम्। विशाम्। अग्निम्। अतिथिम्। सुऽप्रयसम्। मित्रःऽइव। यः। दिधिषाय्यः। भूत्। देवः। आऽदेवे। जने। जातऽवेदाः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 24 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (आदेवे) सब ओर से विद्या प्रकाशयुक्त (जने) विद्वान् मनुष्य के निमित्त (यः) जो (मित्र, इव) मित्र के समान (देवः) व्यवहार का हेतु (दिधिषाय्यः) यथावत् पदार्थों का धारण करनेवाला (जातवेदाः) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान अग्नि प्रसिद्ध (भूत्) होता है उसको (विशाम्) प्रजाजनों के बीच (सुद्योत्मानम्) सुन्दरता से निरन्तर प्रकाशमान (सुप्रयसम्) अच्छे प्रकार मनोहर (सुवृक्तिम्) सुन्दर त्याग करनेवाले (अतिथिम्) अतिथि के समान वर्त्तमान (अग्निम्) अग्नि की (वः) तुम लोगों के लिये (हुवे) प्रशंसा करता हूँ वैसे हम लोगों के लिये तुम अग्नि की प्रशंसा करो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य परस्पर विद्या देके जगत् के प्रकाश को धारण कर वा मित्र के समान सुख देनेवाले विद्वानों को जानने योग्य बिजुलीरूप अग्नि की प्रशंसा करते हैं, वे उसके गुणों को जाननेवाले होते हैं ॥१॥
Subject
अब नव चावाले ४ चतुर्थ सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं ॥