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Rigveda Mandal 2 / Sukta 39 / Mantra 5

43 Sukta
8 Mantra
2/39/5
Devata- अश्विनौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वाते॑वाजु॒र्या न॒द्ये॑व री॒तिर॒क्षीइ॑व॒ चक्षु॒षा या॑तम॒र्वाक्। हस्ता॑विव त॒न्वे॒३॒॑ शंभ॑विष्ठा॒ पादे॑व नो नयतं॒ वस्यो॒ अच्छ॑॥

वाता॑ऽइव । अ॒जु॒र्या । न॒द्या॑ऽइव । री॒तिः । अ॒क्षी इ॒वेत्य॒क्षीऽइ॑व । चक्षु॑षा । आ । या॒त॒म् । अ॒र्वाक् । हस्तौ॑ऽइव । त॒न्वे॑ । शम्ऽभ॑विष्ठा । पादा॑ऽइव । नः॒ । न॒य॒त॒म् । वस्यः॑ । अच्छ॑ ॥

Mantra without Swara
वातेवाजुर्या नद्येव रीतिरक्षीइव चक्षुषा यातमर्वाक्। हस्ताविव तन्वे३ शंभविष्ठा पादेव नो नयतं वस्यो अच्छ॥

वाताऽइव। अजुर्या। नद्याऽइव। रीतिः। अक्षी इवेत्यक्षीऽइव। चक्षुषा। आ। यातम्। अर्वाक्। हस्तौऽइव। तन्वे। शम्ऽभविष्ठा। पादाऽइव। नः। नयतम्। वस्यः। अच्छ॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वानो ! जो (वातेव) पवन के समान (अजुर्या) अजीर्ण अर्थात् पुष्ट (नद्येव) नदी में उत्पन्न हुए जल के समान (रीतिः) मिले हुए शीघ्र जानेवाले वा (अक्षी इव) नेत्रों के समान (चक्षुषा) दिखाने की शक्तियुक्त (अर्वाक्) नीचे (आ,यातम्) सब ओर से प्राप्त होते हैं (हस्ताविव) हाथों के समान (तन्वे) शरीर के लिये (शम्भविष्ठाः) अतीव सुख की भावना करानेवाले (पादेव) पैरों के समान (नः) हम लोगों को (वस्यः) अति उत्तम धन (अच्छ) अच्छे प्रकार (नयतम्) प्राप्त करते हैं उन जल और अग्नि को हम लोगों को बतलाओ ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शरीर के अङ्ग अपने-अपने काम में प्रवर्त्तमान शरीर की रक्षा करते हैं, वैसे वायु आदि पदार्थ सबकी रक्षा करते हैं, यह जानना चाहिये ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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