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Rigveda Mandal 2 / Sukta 38 / Mantra 8

43 Sukta
11 Mantra
2/38/8
Devata- सविता Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
या॒द्रा॒ध्यं१॒॑ वरु॑णो॒ योनि॒मप्य॒मनि॑शितं नि॒मिषि॒ जर्भु॑राणः। विश्वो॑ मार्ता॒ण्डो व्र॒जमा प॒शुर्गा॑त्स्थ॒शो जन्मा॑नि सवि॒ता व्याकः॑॥

या॒त्ऽरा॒ध्य॑म् । वरु॑णः । योनि॑म् । अप्य॑म् । अनि॑ऽशितम् । नि॒ऽमिषि॑ । जर्भु॑राणः । विश्वः॑ । मा॒र्ता॒ण्डः । व्र॒जम् । आ । प॒शुः । गा॒त् । स्थ॒ऽशः । जन्मा॑नि । स॒वि॒ता । वि । आ । अ॒क॒रित्य॑कः ॥

Mantra without Swara
याद्राध्यं१ वरुणो योनिमप्यमनिशितं निमिषि जर्भुराणः। विश्वो मार्ताण्डो व्रजमा पशुर्गात्स्थशो जन्मानि सविता व्याकः॥

यात्ऽराध्यम्। वरुणः। योनिम्। अप्यम्। अनिऽशितम्। निऽमिषि। जर्भुराणः। विश्वः। मार्ताण्डः। व्रजम्। आ। पशुः। गात्। स्थऽशः। जन्मानि। सविता। वि। आ। अकरित्यकः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो (विश्वः) समस्त (मार्त्ताण्डः) सूर्य्यलोक में उत्पन्न और (निमिषि) निमेषादि काल व्यवहार में (जर्भुराणः) निरन्तर धारण करता हुआ (वरुणः) श्रेष्ठ जीव (व्रजम्) गोण्ड़े को (पशुः) जैसे पशु वैसे (याद्राध्यम्) जानेवालों से अच्छे प्रकार सिद्ध होने योग्य (अप्यम्) जलों में प्रसिद्ध (अनिशितम्) अतीक्ष्ण (योनिम्) कारणरूप अग्नि को (आ,गात्) प्राप्त होवे उस जीव के (स्थशः) बहुत ठहरनेवाले (जन्मानि) जन्मों को (सविता) परमात्मा (व्याकः) विविध प्रकार से करता है ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जितने इस जगत् में जीव हैं, वे अपने कर्मजन्य फल को विद्यमान शरीर में और पीछे भी प्राप्त होते हैं। जैसे पशु गोपाल से नियम में रखा हुआ प्राप्तव्य स्थान को प्राप्त होता है, वैसे जगदीश्वर जीवों से अनुष्ठित कर्मों के अनुसार सुख-दुःख और निकृष्ट-मध्यम तथा उत्तम जन्मों को देता है ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।