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Rigveda Mandal 2 / Sukta 38 / Mantra 7

43 Sukta
11 Mantra
2/38/7
Devata- सविता Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वया॑ हि॒तमप्य॑म॒प्सु भा॒गं धन्वान्वा मृ॑ग॒यसो॒ वि त॑स्थुः। वना॑नि॒ विभ्यो॒ नकि॑रस्य॒ तानि॑ व्र॒ता दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्मि॑नन्ति॥

त्वया॑ । हि॒तम् । अप्य॑म् । अ॒प्ऽसु । भा॒गम् । धन्व॑ । अनु॑ । आ । मृ॒ग॒यसः॑ । वि । त॒स्थुः॒ । वना॑नि । विऽभ्यः॑ । नकिः॑ । अ॒स्य॒ । तानि॑ । व्र॒ता । दे॒वस्य॑ । स॒वि॒तुः । मि॒न॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
त्वया हितमप्यमप्सु भागं धन्वान्वा मृगयसो वि तस्थुः। वनानि विभ्यो नकिरस्य तानि व्रता देवस्य सवितुर्मिनन्ति॥

त्वया। हितम्। अप्यम्। अप्ऽसु। भागम्। धन्व। अनु। आ। मृगयसः। वि। तस्थुः। वनानि। विऽभ्यः। नकिः। अस्य। तानि। व्रता। देवस्य। सवितुः। मिनन्ति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे जगदीश्वर ! जो (त्वया) आपके नियम के साथ वर्त्तमान (मृगयसः) मृग आदि वन्य प्राणी (अप्सु) जलों में (हितम्) स्थापित किये हुए वा (अप्यम्) प्राणों में प्रसिद्ध हुए (भागम्) सेवन करने योग्य अंश को (अनु,आ,तस्थुः) अनुकूलता से प्राप्त होते हैं तथा (विभ्यः) पक्षियों के लिये (धन्व) अन्तरिक्ष और (वनानि) वनों को आपने बनाया (तानि) उन (अस्य) इन आप (सवितुः) सकलैश्वर्य्य को प्राप्त करनेवाले (देवस्य) मनोहर ईश्वर के (व्रता) गुण-कर्म-स्वभावों को कोई भी (नकिः) नहीं (विमिनन्ति) नष्ट करते हैं ॥७॥
Essence
यदि ईश्वर भूमि आदि स्थान तथा भोग्य-पेय-चूष्य-लेह्य पदार्थों को न बनावे तो कोई भी शरीर और जीवन को धारण नहीं कर सकता, ईश्वर ने जिनके अर्थ जो नियम स्थापन किये हैं, उसके उल्लङ्घन करने को कोई समर्थ नहीं होता ॥७॥
Subject
अब ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।