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Rigveda Mandal 2 / Sukta 38 / Mantra 6

43 Sukta
11 Mantra
2/38/6
Devata- सविता Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒माव॑वर्ति॒ विष्ठि॑तो जिगी॒षुर्विश्वे॑षां॒ काम॒श्चर॑ताम॒माभू॑त्। शश्वाँ॒ अपो॒ विकृ॑तं हि॒त्व्यागा॒दनु॑ व्र॒तं स॑वि॒तुर्दैव्य॑स्य॥

स॒म्ऽआव॑वर्ति । विऽस्थि॑तः । जि॒गी॒षुः । विश्वे॑षाम् । कामः॑ । चर॑ताम् । अ॒मा । अ॒भू॒त् । शश्वा॑न् । अपः॑ । विऽकृ॑तम् । हि॒त्वी । आ । अ॒गा॒त् । अनु॑ । व्र॒तम् । स॒वि॒तुः । दैव्य॑स्य ॥

Mantra without Swara
समाववर्ति विष्ठितो जिगीषुर्विश्वेषां कामश्चरताममाभूत्। शश्वाँ अपो विकृतं हित्व्यागादनु व्रतं सवितुर्दैव्यस्य॥

सम्ऽआववर्ति। विऽस्थितः। जिगीषुः। विश्वेषाम्। कामः। चरताम्। अमा। अभूत्। शश्वान्। अपः। विऽकृतम्। हित्वी। आ। अगात्। अनु। व्रतम्। सवितुः। दैव्यस्य॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 1

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Meaning
जो (विष्ठितः) विशेषता से स्थित दृढ़ (विश्वेषाम्) समस्त (चरताम्) प्राण धारनेवालों के सुख की (कामः) कामना करने वा (शश्वान्) शीघ्र चलने और (जिगीषुः) जीतने का शील रखनेवाला (अभूत्) होता है वा जो (अमा) घर में (समाववर्त्ति) अच्छे प्रकार वर्त्तमान है (विकृतम्) विकार को प्राप्त हुए (अपः) कर्म को (हित्वी) छोड़ के (दैव्यस्य) विद्वानों से पाये हुए (सवितुः) संसार को उत्पन्न करनेवाले जगदीश्वर के (व्रतम्) नियम को (अनु,आ,अगात्) अनुकूलता से प्राप्त होता वह सुख को भी प्राप्त होता है ॥६॥
Essence
जो मनुष्य सब प्राणियों में सुख-दुःख के व्यवहार में समदर्शी परमेश्वर के उपदेश से विरोध न करनेवाले और पापाचरण को छोड़ निश्चित धर्माचरण को करते हैं, वे निरन्तर सुख को प्राप्त होते हैं ॥६॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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