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Rigveda Mandal 2 / Sukta 38 / Mantra 5

43 Sukta
11 Mantra
2/38/5
Devata- सविता Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नानौकां॑सि॒ दुर्यो॒ विश्व॒मायु॒र्वि ति॑ष्ठते प्रभ॒वः शोको॑ अ॒ग्नेः। ज्येष्ठं॑ मा॒ता सू॒नवे॑ भा॒गमाधा॒दन्व॑स्य॒ केत॑मिषि॒तं स॑वि॒त्रा॥

नाना॑ । ओकां॑सि । दुर्यः॑ । विश्व॑म् । आयुः॑ । वि । ति॒ष्ठ॒ते॒ । प्र॒ऽभ॒वः । शोकः॑ । अ॒ग्नेः । ज्येष्ठ॑म् । मा॒ता । सू॒नवे॑ । भा॒गम् । आ । अ॒धा॒त् । अनु॑ । अ॒स्य॒ । केत॑म् । इ॒षि॒तम् । स॒वि॒त्रा ॥

Mantra without Swara
नानौकांसि दुर्यो विश्वमायुर्वि तिष्ठते प्रभवः शोको अग्नेः। ज्येष्ठं माता सूनवे भागमाधादन्वस्य केतमिषितं सवित्रा॥

नाना। ओकांसि। दुर्यः। विश्वम्। आयुः। वि। तिष्ठते। प्रऽभवः। शोकः। अग्नेः। ज्येष्ठम्। माता। सूनवे। भागम्। आ। अधात्। अनु। अस्य। केतम्। इषितम्। सवित्रा॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो जहाँ (नाना) अनेक प्रकार के (दुर्य्यः) द्वारवान् (ओकांसि) घर हैं वा जहाँ (सवित्रा) सूर्य्यलोक के साथ (अग्नेः) बिजली आदि रूप अग्नि से (विश्वम्) समस्त (आयुः) जीवन को (वि,तिष्ठते) विशेषता से स्थिर करता है तथा (प्रभवः) उत्पत्ति और (शोकः) मरण भी होता है जहाँ (माता) जननी (सूनवे) सन्तान के लिये (ज्येष्ठम्) प्रशंसनीय (भागम्) भाग को और (अनु,अस्य) अनुकूल इस सन्तान को (इषितम्) इष्ट अभीष्ट चाहे हुये (केतम्) विज्ञान को (आ,अधात्) अच्छे प्रकार धारण करती उसमें वा इस जगत् में यथावत् वर्त्ताव करना चाहिये ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो तुम्हारे जन्म हुए तो मरण भी होगा इसके बीच सब तुओं में सुख देनेवाले घरों को बनाकर विद्यावृद्धि के लिये पाठशालायें बनाये, अपने कन्या और पुत्रों को विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त कर पूर्ण आयु को भोग के यश का विस्तार करना चाहिये ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।