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Rigveda Mandal 2 / Sukta 38 / Mantra 4

43 Sukta
11 Mantra
2/38/4
Devata- सविता Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पुनः॒ सम॑व्य॒द्वित॑तं॒ वय॑न्ती म॒ध्या कर्तो॒र्न्य॑धा॒च्छक्म॒ धीरः॑। उत्सं॒हाया॑स्था॒द्व्यृ१॒॑तूँर॑दर्धर॒रम॑तिः सवि॒ता दे॒व आगा॑त्॥

पुन॒रिति॑ । सम् । अ॒व्य॒त् । विऽत॑तम् । वय॑न्ती । म॒ध्या । कर्तोः॑ । नि । अ॒धा॒त् । शक्म॑ । धीरः॑ । उत् । स॒म्ऽहाय॑ । अ॒स्था॒त् । वि । ऋ॒तून् । अ॒द॒र्धः॒ । अ॒रम॑तिः । स॒वि॒ता । दे॒वः । आ । अ॒गा॒त् ॥

Mantra without Swara
पुनः समव्यद्विततं वयन्ती मध्या कर्तोर्न्यधाच्छक्म धीरः। उत्संहायास्थाद्व्यृ१तूँरदर्धररमतिः सविता देव आगात्॥

पुनरिति। सम्। अव्यत्। विऽततम्। वयन्ती। मध्या। कर्तोः। नि। अधात्। शक्म। धीरः। उत्। सम्ऽहाय। अस्थात्। वि। ऋतून्। अदर्धः। अरमतिः। सविता। देवः। आ। अगात्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (धीरः) धीर बुद्धिमान् (मध्या) आकाश के बीच (वयन्ती) चलती हुई पृथिवी (विततम्) जो पदार्थ अपने में व्याप्त उसको (सम्,अव्यत्) सम्यक् व्याप्त होती (कर्त्तोः) और करने योग्य जाने-आने के काम को तथा (शक्म) शक्ति के अनुकूल जो कर्म है उसको (नि,अधात्) निरन्तर धारण करती है (पुनः) फिर पूर्व देश को (संहाय) अच्छे प्रकार छोड़ उत्तर अर्थात् दूसरे देश को प्राप्त होती हुई (उत्,अस्थात्) स्थित होती उसको जानता है, जो (अरमतिः) बिना रमण विद्यमान है वह (सविता) सूर्य्यलोक (देवः) प्रकाशमान होता हुआ (तून्) तुओं को (व्यदर्धः) निरन्तर अलग करता तथा निकट के पदार्थों को (आ,अगात्) प्राप्त होता उसको जो जानता है, वह भूगोल और खगोल विद्या का जाननेवाला होता है ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! ये सब लोक अन्तरिक्ष में ठहरे हुए भ्रमणशील ईश्वर ने नियम को पहुँचाये हुए हैं, उनमें सूर्य के सन्निकट और भ्रमण से छः तु होते हैं, यह जानना चाहिये ॥४॥
Subject
अब सूर्यलोक विषय को अगल मन्त्र में कहा है।