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Rigveda Mandal 2 / Sukta 38 / Mantra 3

43 Sukta
11 Mantra
2/38/3
Devata- सविता Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒शुभि॑श्चि॒द्यान्वि मु॑चाति नू॒नमरी॑रम॒दत॑मानं चि॒देतोः॑। अ॒ह्यर्षू॑णां चि॒न्न्य॑याँ अवि॒ष्यामनु॑ व्र॒तं स॑वि॒तुर्मोक्यागा॑त्॥

आशुऽभिः॑ । चि॒त् । यान् । वि । मु॒चा॒ति॒ । नू॒नम् । अरी॑रमत् । अत॑मानम् । चि॒त् । एतोः॑ । अ॒ह्यर्षू॑णाम् । चि॒त् । नि । अ॒या॒न् । अ॒वि॒ष्याम् । अनु॑ । व्र॒तम् । स॒वि॒तुः । मोकी॑ । आ । अ॒गा॒त् ॥

Mantra without Swara
आशुभिश्चिद्यान्वि मुचाति नूनमरीरमदतमानं चिदेतोः। अह्यर्षूणां चिन्न्ययाँ अविष्यामनु व्रतं सवितुर्मोक्यागात्॥

आशुऽभिः। चित्। यान्। वि। मुचाति। नूनम्। अरीरमत्। अतमानम्। चित्। एतोः। अह्यर्षूणाम्। चित्। नि। अयान्। अविष्याम्। अनु। व्रतम्। सवितुः। मोकी। आ। अगात्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो (मोकी) रात्रि (आशुभिः) घोड़ों के समान शीघ्रकारी पदार्थों से (यान्) जिन (अयान्) प्राप्त वस्तुओं को (वि,मुचाति) छोड़े (एतोः) इसको (अतमानम्) निरन्तर प्राप्त (चित्) भी पदार्थ (नूनम्) निश्चय करके (अरीरमत्) रमण करता है (अह्यर्षूणाम्) और जो मेघ को प्राप्त होते हैं उन पदार्थों की (चित्) भी (अविष्याम्) रक्षा को (सवितुः) जगदीश्वर का जैसे (अनुव्रतम्) अनुकूल वा नियम वैसे (नि,आ,अगात्) प्राप्त होता है यह उक्त समस्त काम (चित्) भी जगदीश्वर के नियम से होता है ॥३॥
Essence
यदि ईश्वर नियम से पृथिवी को न घुमावे तो सुख देनेवाली रात्रि न सिद्ध हो, पृथिवी में जितना देश सूर्य के निकट होता है, उसमें दिन और दूसरे में रात्रि, ये दोनों निरन्तर वर्त्तमान हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।