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Rigveda Mandal 2 / Sukta 38 / Mantra 11

43 Sukta
11 Mantra
2/38/11
Devata- सविता Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्मभ्यं॒ तद्दि॒वो अ॒द्भ्यः पृ॑थि॒व्यास्त्वया॑ द॒त्तं काम्यं॒ राध॒ आ गा॑त्। शं यत्स्तो॒तृभ्य॑ आ॒पये॒ भवा॑त्युरु॒शंसा॑य सवितर्जरि॒त्रे॥

अ॒स्मभ्य॑म् । तत् । दि॒वः । अ॒त्ऽभ्यः । पृ॒थि॒व्याः । त्वया॑ । द॒त्तम् । काम्य॑म् । राधः॑ । आ । गा॒त् । शम् । यत् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । आ॒पये॑ । भवा॑ति । उ॒रु॒ऽशंसा॑य । स॒वि॒तः॒ । ज॒रि॒त्रे ॥

Mantra without Swara
अस्मभ्यं तद्दिवो अद्भ्यः पृथिव्यास्त्वया दत्तं काम्यं राध आ गात्। शं यत्स्तोतृभ्य आपये भवात्युरुशंसाय सवितर्जरित्रे॥

अस्मभ्यम्। तत्। दिवः। अत्ऽभ्यः। पृथिव्याः। त्वया। दत्तम्। काम्यम्। राधः। आ। गात्। शम्। यत्। स्तोतृऽभ्यः। आपये। भवाति। उरुऽशंसाय। सवितः। जरित्रे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सवितः) परमात्मन् ! (त्वया) आपने (दत्तम्) दिया हुआ (दिवः) प्रकाशमान लोक (अद्भ्यः) जलों और (पृथिव्याः) भूमि से (यत्) जो (काम्यम्) कामना करने योग्य (राधः) धन (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (आ,गात्) प्राप्त हो (तत्) वह (उरुशंसाय) बहुतों ने प्रशंसा किये हुए (जरित्रे) प्रशंसित (आपये) विद्या व्यापक के लिये और (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों के लिये (शम्) कल्याणरूप (भवाति) हो ॥११॥
Essence
परमेश्वर ने प्रकृति से महत्तत्त्व, महत्तत्त्व से अहंकार, अहंकार से पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्राओं से एकादश इन्द्रियाँ और स्थूल पञ्चभूत और ओषधियाँ बनाईं, जिनसे सब प्राणियों का सुख होता है ॥११॥ इस सूक्त में ईश्वर, सूर्य, और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह अड़तीसवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।