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Rigveda Mandal 2 / Sukta 38 / Mantra 1

43 Sukta
11 Mantra
2/38/1
Devata- सविता Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उदु॒ ष्य दे॒वः स॑वि॒ता स॒वाय॑ शश्वत्त॒मं तद॑पा॒ वह्नि॑रस्थात्। नू॒नं दे॒वेभ्यो॒ वि हि धाति॒ रत्न॒मथाभ॑जद्वी॒तिहो॑त्रं स्व॒स्तौ॥

उत् । ऊँ॒ इति॑ । स्यः । दे॒वः । स॒वि॒ता । स॒वाय॑ । श॒श्व॒त्ऽत॒मम् । तत्ऽअ॑पाः । वह्निः॑ । अ॒स्था॒त् । नू॒नम् । दे॒वेभ्यः॑ । वि । हि । धाति॑ । रत्न॑म् । अथ॑ । अ॒भ॒ज॒त् । वी॒तिऽहो॑त्रम् । स्व॒स्तौ ॥

Mantra without Swara
उदु ष्य देवः सविता सवाय शश्वत्तमं तदपा वह्निरस्थात्। नूनं देवेभ्यो वि हि धाति रत्नमथाभजद्वीतिहोत्रं स्वस्तौ॥

उत्। ऊँ इति। स्यः। देवः। सविता। सवाय। शश्वत्ऽतमम्। तत्ऽअपाः। वह्निः। अस्थात्। नूनम्। देवेभ्यः। वि। हि। धाति। रत्नम्। अथ। अभजत्। वीतिऽहोत्रम्। स्वस्तौ॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 1

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Meaning
जो (वह्निः) पहुँचनेवाला (तदपाः) जिसका पहचानना ही कर्म है (सविता) सकल जगत् का उत्पादनकर्त्ता (देवः) देदीप्यमान जगदीश्वर (सवाय) उत्पन्न करने के लिये (शश्वत्तमम्) अनादिस्वरूप अनुत्पन्न कारण को (देवेभ्यः) क्रीडा करते हुये जीवों से (नूनम्) निश्चित (उदस्थात्) उपस्थित होता है (उ) और (स्यः) वह (हि) ही (रत्नम्) रमणीय जगत् को (वि,धाति) विधान करता है (अथ) इसके अनन्तर (स्वस्तौ) सुख के निमित्त (वीतिहोत्रम्) ग्रहण की ईश्वर की व्याप्ति में अपनी व्याप्ति जिसमें ऐसे जगत् को (अभजत्) सेवता है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो अनादि त्रिगुणात्मक प्रकृतिस्वरूप जगत् का कारण है, उसी से सब जगत् को उत्पन्न कर जो धारण कर रहा है, उससे सब जीव निज-निज शरीर और कर्म को सेवते हैं, जो इस जगत् को जगदीश्वर न उत्पादन करे तो कोई भी जीव शरीरादि न पा सके ॥१॥
Subject
अब अड़तीसवें सूक्त का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में ईश्वर के विषय को कहते हैं।

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