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Rigveda Mandal 2 / Sukta 37 / Mantra 6

43 Sukta
6 Mantra
2/37/6
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जोष्य॑ग्ने स॒मिधं॒ जोष्याहु॑तिं॒ जोषि॒ ब्रह्म॒ जन्यं॒ जोषि॑ सुष्टु॒तिम्। विश्वे॑भि॒र्विश्वाँ॑ ऋ॒तुना॑ वसो म॒ह उ॒शन्दे॒वाँ उ॑श॒तः पा॑यया ह॒विः॥

जोषि॑ । अ॒ग्ने॒ । स॒म्ऽइध॑म् । जोषि॑ । आऽहु॑तिम् । जोषि॑ । ब्रह्म॑ । जन्य॑म् । जोषि॑ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । विश्वे॑भिः । विश्वा॑न् । ऋ॒तुना॑ । व॒सो॒ इति॑ । म॒हः । उ॒शन् । दे॒वान् । उ॒श॒तः । पा॒य॒य॒ । ह॒विः ॥

Mantra without Swara
जोष्यग्ने समिधं जोष्याहुतिं जोषि ब्रह्म जन्यं जोषि सुष्टुतिम्। विश्वेभिर्विश्वाँ ऋतुना वसो मह उशन्देवाँ उशतः पायया हविः॥

जोषि। अग्ने। सम्ऽइधम्। जोषि। आऽहुतिम्। जोषि। ब्रह्म। जन्यम्। जोषि। सुऽस्तुतिम्। विश्वेभिः। विश्वान्। ऋतुना। वसो इति। महः। उशन्। देवान्। उशतः। पायय। हविः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 1 Mantra » 6

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् (वसो) निवास करानेवाले अग्नि के समान आप जिस कारण (समिधम्) प्रदीप्त करनेवाली क्रिया को (जोषि) सेवते (आहुतिम्) वेदी में डाली हुई वस्तु (जोषि) सेवते (ब्रह्म) अन्न और (विश्वान्) सब पदार्थों का (जोषि) सेवन करते (जन्यम्) उत्पन्न करने योग्य पदार्थ वा (सुष्टुतिम्) सुन्दर प्रशंसा को (जोषि) सेवते इस कारण (विश्वेभिः) सब (तुना) वसन्त आदि तुसमूह के साथ (महः) बड़े-बड़े (उशतः) कामना करनेवाले (देवान्) विद्वानों की (उशन्) कामना करते हुए आप उनको (हविः) देने योग्य वस्तु (पायय) पियाओ ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजली रूप अग्नि काष्ठ आदि पदार्थों का सेवन करके भी नहीं जलाता, वैसे ही सबके साथ बसकर उनका नाश न करना चाहिये, ऐसे होने पर काम सिद्धि होती है ॥६॥ इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सैंतीसवाँ सूक्त और प्रथम वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।