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Rigveda Mandal 2 / Sukta 37 / Mantra 4

43 Sukta
6 Mantra
2/37/4
Devata- द्रविणोदाः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अपा॑द्धो॒त्रादु॒त पो॒त्राद॑मत्तो॒त ने॒ष्ट्राद॑जुषत॒ प्रयो॑ हि॒तम्। तु॒रीयं॒ पात्र॒ममृ॑क्त॒मम॑र्त्यं द्रविणो॒दाः पि॑बतु द्रविणोद॒सः॥

अपा॑त् । हो॒त्रात् । उ॒त । पो॒त्रात् । अ॒म॒त्त॒ । उ॒त । ने॒ष्ट्रात् । अ॒जु॒ष॒त॒ । प्रयः॑ । हि॒तम् । तु॒रीय॑म् । पात्र॑म् । अमृ॑क्तम् । अम॑र्त्यम् । द्र॒वि॒णः॒ऽदाः॒ । पि॒ब॒तु॒ । द्रा॒वि॒णो॒द॒सः ॥

Mantra without Swara
अपाद्धोत्रादुत पोत्रादमत्तोत नेष्ट्रादजुषत प्रयो हितम्। तुरीयं पात्रममृक्तममर्त्यं द्रविणोदाः पिबतु द्रविणोदसः॥

अपात्। होत्रात्। उत। पोत्रात्। अमत्त। उत। नेष्ट्रात्। अजुषत। प्रयः। हितम्। तुरीयम्। पात्रम्। अमृक्तम्। अमर्त्यम्। द्रविणःऽदाः। पिबतु। द्रविणोदसः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 1 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (द्रविणोदाः) धन देनेवाला (होत्रात्) हवन से (उत) और (पोत्रात्) पवित्र व्यवहार से (प्रयः) मनोहर अन्नादि पदार्थ (हितम्) जो कि सुख करनेवाला है उसको (अपात्) पीये (अमत्त) हर्ष को प्राप्त हो (उत) और (नेष्ट्रात्) पदार्थ प्राप्ति से (अजुषत) प्रसन्न हो वैसे (द्रविणोदसः) जो धन को भोगता उस त्विज् का मनोहर अन्नादि पदार्थ जो सुख करनेवाला (तुरीयम्) चतुर्थ (अमर्त्यम्) नष्ट होनेपन से रहित (अमृक्तम्) अकोमल (पात्रम्) जो पीने योग्य है उसको (पिबतु) पिओ ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो हवन और अपवित्र को पवित्र करनेवाली प्राप्ति से हित साध सकते हैं, वे प्रीतिमान् होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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