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Rigveda Mandal 2 / Sukta 37 / Mantra 3

43 Sukta
6 Mantra
2/37/3
Devata- द्रविणोदाः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
मेद्य॑न्तु ते॒ वह्न॑यो॒ येभि॒रीय॒सेऽरि॑षण्यन्वीळयस्वा वनस्पते। आ॒यूया॑ धृष्णो अभि॒गूर्या॒ त्वं ने॒ष्ट्रात्सोमं॑ द्रविणोदः॒ पिब॑ ऋ॒तुभिः॑॥

मेद्य॑न्तु । ते॒ । वह्न॑यः । येभिः॑ । ईय॑से । अरि॑षण्यन् । वी॒ळ॒य॒स्व॒ । व॒न॒स्प॒ते॒ । आ॒ऽयूय॑ । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । अ॒भि॒ऽगूर्य॑ । त्वम् । ने॒ष्ट्रात् । सोम॑म् । द्र॒वि॒णः॒ऽदः॒ । पिब॑ । ऋ॒तुऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
मेद्यन्तु ते वह्नयो येभिरीयसेऽरिषण्यन्वीळयस्वा वनस्पते। आयूया धृष्णो अभिगूर्या त्वं नेष्ट्रात्सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः॥

मेद्यन्तु। ते। वह्नयः। येभिः। ईयसे। अरिषण्यन्। वीळयस्व। वनस्पते। आऽयूय। धृष्णो इति। अभिऽगूर्य। त्वम्। नेष्ट्रात्। सोमम्। द्रविणःऽदः। पिब। ऋतुऽभिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 1 Mantra » 3

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Meaning
हे (द्रविणोदः) धन के देने और (वनस्पते) किरणसमूह की रक्षा करनेवाले (धृष्णो) प्रगल्भ आप जैसे (वह्नयः) पदार्थ पहुँचानेवाले (ते) आपके (सोमम्) ओषध्यादि रस को (मेद्यन्तु) सचिक्कन अपने को चाहें वा (येभिः) जिनके साथ आप (ईयसे) प्राप्त होते हो वैसे उनके साथ (अरिषण्यन्) धन की न काङ्क्षा करते हुए (वीळयस्व) स्तुति कीजिये (अभिगूर्य) और सब ओर से उद्यम कर (आयूय) और मेलकर (नेष्ट्रात्) प्राप्ति से (त्वम्) आप (तुभिः) वसन्तादि तुओं के साथ (सोमम्) ओषध्यादि के रस को (पिब) पिओ ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। किसी को बिना उद्यम के न रहना चाहिये और तुओं के प्रति अनुकूल व्यवहार करके सुख बढ़ाना चाहिये ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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