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Rigveda Mandal 2 / Sukta 36 / Mantra 6

43 Sukta
6 Mantra
2/36/6
Devata- मित्रावरुणौ नभस्यश्च Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जु॒षेथां॑ य॒ज्ञं बोध॑तं॒ हव॑स्य मे स॒त्तो होता॑ नि॒विदः॑ पू॒र्व्या अनु॑। अच्छा॒ राजा॑ना॒ नम॑ एत्या॒वृतं॑ प्रशा॒स्त्रादा पि॑बतं सो॒म्यं मधु॑॥

जु॒षेथा॑म् । य॒ज्ञम् । बोध॑तम् । हव॑स्य । मे॒ । स॒त्तः । होता॑ । नि॒ऽविदः॑ । पू॒र्व्याः । अनु॑ । अच्छ॑ । राजा॑ना । नमः॑ । ए॒ति॒ । आ॒ऽवृत॑म् । प्र॒ऽशा॒स्त्रात् । आ । पि॒ब॒त॒म् । सो॒म्यम् । मधु॑ ॥

Mantra without Swara
जुषेथां यज्ञं बोधतं हवस्य मे सत्तो होता निविदः पूर्व्या अनु। अच्छा राजाना नम एत्यावृतं प्रशास्त्रादा पिबतं सोम्यं मधु॥

जुषेथाम्। यज्ञम्। बोधतम्। हवस्य। मे। सत्तः। होता। निऽविदः। पूर्व्याः। अनु। अच्छ। राजाना। नमः। एति। आऽवृतम्। प्रऽशास्त्रात्। आ। पिबतम्। सोम्यम्। मधु॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 6

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Meaning
हे (राजाना) राजजनो ! (मे) मेरे (हवस्य) देने-लेने योग्य व्यवहारसम्बन्धी (यज्ञम्) विद्वानों के सत्कार आदि काम को (जुषेथाम्) सेवो (पूर्व्याः) पूर्व विद्वानों ने सेवन की हुई (निविदः) जिनसे निरन्तर विषयों को जानते हैं उन वाणियों को (अच्छ, अनु, बोधतम्) अच्छे प्रकार अनुकूलता से जानो जैसे (सत्तः) प्रतिष्ठित (होता) देनेवाला (आवृतम्) अत्युत्तमता से ढपे हुए (नमः) अन्न को (एति) प्राप्त होता है वैसे तुम दोनों (प्रशास्त्रात्) उत्तम शिक्षा करनेवाले से (सोम्यम्) शान्ति वा शीतलता के योग्य (मधु) मधुर गुणयुक्त रस को (आ, पिबतम्) अच्छे प्रकार पिओ ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे पढ़ाने वा उपदेश करनेवाले आप लोगों के प्रति प्रीति से विद्यादान और सत्योपदेश के साथ वर्त्तमान हैं, वैसे आप भी वर्त्तें ॥६॥ इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह छत्तीसवाँ सूक्त पच्चीसवाँ वर्ग और सप्तमाध्याय समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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