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Rigveda Mandal 2 / Sukta 36 / Mantra 4

43 Sukta
6 Mantra
2/36/4
Devata- अग्निः शुचिश्च Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ व॑क्षि दे॒वाँ इ॒ह वि॑प्र॒ यक्षि॑ चो॒शन्हो॑त॒र्नि ष॑दा॒ योनि॑षु त्रि॒षु। प्रति॑ वीहि॒ प्रस्थि॑तं सो॒म्यं मधु॒ पिबाग्नी॑ध्रा॒त्तव॑ भा॒गस्य॑ तृप्णुहि॥

आ । व॒क्षि॒ । दे॒वान् । इ॒ह । वि॒प्र॒ । यक्षि॑ । च॒ । उ॒शन् । हो॒तः॒ । नि । स॒द॒ । योनि॑षु । त्रि॒षु । प्रति॑ । वी॒हि॒ । प्रऽस्थि॑तम् । सो॒म्यम् । मधु॑ । पि॒ब॒ । आग्नी॑ध्रात् । तव॑ । भा॒गस्य॑ । तृ॒प्णु॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
आ वक्षि देवाँ इह विप्र यक्षि चोशन्होतर्नि षदा योनिषु त्रिषु। प्रति वीहि प्रस्थितं सोम्यं मधु पिबाग्नीध्रात्तव भागस्य तृप्णुहि॥

आ। वक्षि। देवान्। इह। विप्र। यक्षि। च। उशन्। होतः। नि। सद। योनिषु। त्रिषु। प्रति। वीहि। प्रऽस्थितम्। सोम्यम्। मधु। पिब। आग्नीध्रात्। तव। भागस्य। तृप्णुहि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (होतः) सुख के देनेवाले (उशन्) कामना करते हुए (विप्र) मेधावी जन ! आप नियत अपने कर्म वा (इह) इस संसार में (देवान्) दिव्य गुणों को (आ,वक्षि) अच्छे प्रकार कहते (च) और प्राप्त हुए कर्मों को (यक्षि) प्राप्त होवे तथा दूसरे प्राणियों को उनका उपदेश देते हैं इसी से (त्रिषु) कर्म-उपासना-ज्ञान इन तीनों (योनिषु) निमित्तों में (निषद) निरन्तर स्थिर हों और (प्रस्थितम्) प्रकर्षता से स्थिति विषय को (प्रति,वीहि) प्राप्त होओ (सोम्यम्) शीतल गुण सम्पन्न (मधु) मीठे जल को (पिब) पीओ और (तव) तुम्हारे (भागस्य) सेवने योग्य व्यवहार के (आग्नीध्रात्) उस भाग से जिससे अग्नि को धारण करते हैं (तृप्णुहि) तृप्त हूजिये ॥४॥
Essence
जो मनुष्य कर्मोपासना और ज्ञानों में प्रयत्न कर सत्य की कामना करते हुए मनुष्यों को अध्यापन और उपदेश से विद्वान् करते हैं, वे नित्य सुख को प्राप्त होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।