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Rigveda Mandal 2 / Sukta 36 / Mantra 1

43 Sukta
6 Mantra
2/36/1
Devata- इन्द्रो मधुश्च Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तुभ्यं॑ हिन्वा॒नो व॑सिष्ट॒ गा अ॒पोऽधु॑क्षन्त्सी॒मवि॑भि॒रद्रि॑भि॒र्नरः॑। पिबे॑न्द्र॒ स्वाहा॒ प्रहु॑तं॒ वष॑ट्कृतं हो॒त्रादा सोमं॑ प्रथ॒मो य ईशि॑षे॥

तुभ्य॑म् । हि॒न्वा॒नः । व॒सि॒ष्ट॒ । गाः । अ॒पः । अधु॑क्षन् । सी॒म् । अवि॑ऽभिः । अद्रि॑ऽभिः । नरः॑ । पिब॑ । इ॒न्द्र॒ । स्वाहा॑ । प्रऽहु॑तम् । वष॑ट्ऽकृतम् । हो॒त्रात् । आ । सोम॑म् । प्र॒थ॒मः । यः । ईशि॑षे ॥

Mantra without Swara
तुभ्यं हिन्वानो वसिष्ट गा अपोऽधुक्षन्त्सीमविभिरद्रिभिर्नरः। पिबेन्द्र स्वाहा प्रहुतं वषट्कृतं होत्रादा सोमं प्रथमो य ईशिषे॥

तुभ्यम्। हिन्वानः। वसिष्ट। गाः। अपः। अधुक्षन्। सीम्। अविऽभिः। अद्रिऽभिः। नरः। पिब। इन्द्र। स्वाहा। प्रऽहुतम्। वषट्ऽकृतम्। होत्रात्। आ। सोमम्। प्रथमः। यः। ईशिषे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 1

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Meaning
हे (इन्द्र) यज्ञपति ! जो (हिन्वानः) वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (वसिष्ट) वसे वा, हे (नरः) नायक सर्वोत्तम जनों ! आप लोग (अविभिः) रक्षा करनेवाले (अद्रिभिः) मेघों के साथ (सीम्) आदित्य के समान (गाः) वाणी और (अपः) प्राणों को (अधुक्षन्) पूर्ण करो, हे (इन्द्र) यज्ञपते ! (प्रथमः) आदिभूत आप (स्वाहा) उत्तम क्रिया के साथ (प्रहुतम्) अत्युत्तमता से गृहीत (होत्रात्) दान के कारण (वषट्कृतम्) क्रिया से सिद्ध किये हुए (सोमम्) उत्तम ओषधियों के रस को (आ, पिब) अच्छे प्रकार पीओ (यः) जो आप सबके (ईशिषे) ईश्वर हो अर्थात् स्वामी अधिपति हो, वह आप भी वैसे होओ ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो यज्ञानुष्ठान से जल को शुद्ध कर उससे उत्पन्न हुए ओषधियों के रस को पीकर धर्म के अनुष्ठान से ऐश्वर्य अपने या औरों के लिये बढ़ाते हैं, वे सब ओर से बढ़ते हैं ॥१॥
Subject
अब छः चा वाले छत्तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों के गुणों का वर्णन करते हैं ।