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Rigveda Mandal 2 / Sukta 35 / Mantra 7

43 Sukta
15 Mantra
2/35/7
Devata- अपान्नपात् Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स्व आ दमे॑ सु॒दुघा॒ यस्य॑ धे॒नुः स्व॒धां पी॑पाय सु॒भ्वन्न॑मत्ति। सो अ॒पां नपा॑दू॒र्जय॑न्न॒प्स्व१॒॑न्तर्व॑सु॒देया॑य विध॒ते वि भा॑ति॥

स्वे । आ । दमे॑ । सु॒ऽदुघा॑ । यस्य॑ । धे॒नुः । स्व॒धाम् । पी॒पा॒य॒ । सु॒ऽभु । अन्न॑म् । अ॒त्ति॒ । सः । अ॒पाम् । नपा॑त् । ऊ॒र्जय॑न् । अ॒प्ऽसु । अ॒न्तः । व॒सु॒ऽदेया॑य । वि॒ध॒ते । वि । भा॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
स्व आ दमे सुदुघा यस्य धेनुः स्वधां पीपाय सुभ्वन्नमत्ति। सो अपां नपादूर्जयन्नप्स्व१न्तर्वसुदेयाय विधते वि भाति॥

स्वे। आ। दमे। सुऽदुघा। यस्य। धेनुः। स्वधाम्। पीपाय। सुऽभु। अन्नम्। अत्ति। सः। अपाम्। नपात्। ऊर्जयन्। अप्ऽसु। अन्तः। वसुऽदेयाय। विधते। वि। भाति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 23 Mantra » 2

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Meaning
जिसके (स्वे) अपने (दमे) घर में (सुदुघा) सुन्दरता से पूर्ण करनेवाली (धेनुः) विद्या और शिक्षायुक्त वाणी प्रवृत्त है (सः) वह (अपाम्,नपात्) प्राणों के बीच अविनाशी होता और (अप्सु) प्राणों के (अन्तः) भीतर (ऊर्जयन्) बल को प्राप्त होता हुआ (स्वधाम्) सुन्दर जल को (पीपाय) पीता और (सुभु) सुन्दर संस्कारों से भावना दी जाती उस (अन्नम्) भोजन करने योग्य अन्न को (अत्ति) खाता है तथा (विधते) सेवा करते हुए (वसुदेयाय) जिसे धन देना योग्य है उसके लिये (आ,विभाति) प्रकाश को प्राप्त होता है ॥७॥
Essence
जो मनुष्य अपने सम्बन्धियों में कामों की परिपूर्णता के लिये सुन्दर शिक्षित वाणी सुन्दर शुधा हुआ जल और सुन्दर संस्कार किये हुए अन्नों की सेवा करते सुन्दर शिक्षित सेवक के लिये यथायोग्य वस्तु देते और काल पर सब व्यवहारों को सेवते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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