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Rigveda Mandal 2 / Sukta 34 / Mantra 7

43 Sukta
15 Mantra
2/34/7
Devata- मरुतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तं नो॑ दात मरुतो वा॒जिनं॒ रथ॑ आपा॒नं ब्रह्म॑ चि॒तय॑द्दि॒वेदि॑वे। इषं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ वृ॒जने॑षु का॒रवे॑ स॒निं मे॒धामरि॑ष्टं दु॒ष्टरं॒ सहः॑॥

तम् । नः॒ । दा॒त॒ । म॒रु॒तः॒ । वा॒जिन॑म् । रथे॑ । आ॒पा॒नम् । ब्रह्म॑ । चि॒तय॑त् । दि॒वेऽदि॑वे । इष॑म् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । वृ॒जने॑षु । का॒रवे॑ । स॒निम् । मे॒धाम् । अरि॑ष्टम् । दु॒स्तर॑म् । सहः॑ ॥

Mantra without Swara
तं नो दात मरुतो वाजिनं रथ आपानं ब्रह्म चितयद्दिवेदिवे। इषं स्तोतृभ्यो वृजनेषु कारवे सनिं मेधामरिष्टं दुष्टरं सहः॥

तम्। नः। दात। मरुतः। वाजिनम्। रथे। आपानम्। ब्रह्म। चितयत्। दिवेऽदिवे। इषम्। स्तोतृऽभ्यः। वृजनेषु। कारवे। सनिम्। मेधाम्। अरिष्टम्। दुस्तरम्। सहः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) प्राणवायु के समान प्रिय तुम (नः) हम लोगों के लिये (तम्) उस समस्त विद्या की स्तुति करनेवाले को (दात) देओ (रथे) रथ के निमित्त (वाजिनम्) सुशिक्षित घोड़े को देओ (दिवेदिवे) प्रतिदिन (चितवत्) चिताते हुए (आपानम्) व्यापक (ब्रह्म) धन वा अन्न को (वृजनेषु) बलों में (स्तोतृभ्यः) सकल विद्याओं के प्रयोजनवेत्ताओं के लिये (इयम्) इस प्रयोजन को (कारवे) करनेवाले के लिये (सनिम्) अलग-अलग बड़ी हुई (मेधाम्) उत्तम बुद्धि को और (अरिष्टम्) अविनष्ट (दुष्टरम्) दुःख से तैरने को योग्य (सहः) बल को देओ ॥७॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सदैव सबके लिये सकल विद्या बतानेवाले से धर्म से संचित किया हुआ धन विद्वानों के देने के लिये अन्न उत्तम प्रज्ञा और पूर्ण बल को माँगें, विद्वान् जन निश्चय से याचकों के लिये उन उक्त पदार्थों को निरन्तर देवें ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।