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Rigveda Mandal 2 / Sukta 34 / Mantra 6

43 Sukta
15 Mantra
2/34/6
Devata- मरुतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ नो॒ ब्रह्मा॑णि मरुतः समन्यवो न॒रां न शंसः॒ सव॑नानि गन्तन। अश्वा॑मिव पिप्यत धे॒नुमूध॑नि॒ कर्ता॒ धियं॑ जरि॒त्रे वाज॑पेशसम्॥

आ । नः॒ । ब्रह्मा॑णि । म॒रु॒तः॒ । स॒ऽम॒न्य॒वः॒ । न॒राम् । न । शंसः॑ । सव॑नानि । ग॒न्त॒न॒ । अश्वा॑म्ऽइव । पि॒प्य॒त॒ । धे॒नुम् । ऊध॑नि । कर्ता॑ । धिय॑म् । ज॒रि॒त्रे । वाज॑ऽपेशसम् ॥

Mantra without Swara
आ नो ब्रह्माणि मरुतः समन्यवो नरां न शंसः सवनानि गन्तन। अश्वामिव पिप्यत धेनुमूधनि कर्ता धियं जरित्रे वाजपेशसम्॥

आ। नः। ब्रह्माणि। मरुतः। सऽमन्यवः। नराम्। न। शंसः। सवनानि। गन्तन। अश्वाम्ऽइव। पिप्यत। धेनुम्। ऊधनि। कर्ता। धियम्। जरित्रे। वाजऽपेशसम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 20 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (समन्यवः) क्रोध से युक्त (मरुतः) मनुष्यो ! तुम (नः) हम लोगों के लिये (ब्रह्माणि) धनों को (कर्त्त) सिद्ध करो (अश्वामिव) घोड़ी के समान (ऊधनि) रात्रि में (धेनुम्) वाणी को (पिप्यत) प्राप्त होओ (नराम्) मनुष्यों की (न) जैसे (शंसः) स्तुति वैसे (सवनानि) ऐश्वर्यों को (आ,गन्तन) प्राप्त होओ (जरित्रे) स्तुति करनेवाले के लिये (वाजपेशसम्) विज्ञान का जिसमें रूप विद्यमान उस (धियम्) उत्तम बुद्धि को सिद्ध करो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य मनुष्यस्वभाव से उत्पन्न हुई प्रशंसा को प्राप्त होके उत्तम विद्या, वाणी और उत्तम बुद्धि को बढ़ाकर सर्वमनुष्यों को सुखों से अलंकृत करें, वे सुखी होते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।