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Rigveda Mandal 2 / Sukta 34 / Mantra 5

43 Sukta
15 Mantra
2/34/5
Devata- मरुतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इन्ध॑न्वभिर्धे॒नुभी॑ र॒प्शदू॑धभिरध्व॒स्मभिः॑ प॒थिभि॑र्भ्राजदृष्टयः। आ हं॒सासो॒ न स्वस॑राणि गन्तन॒ मधो॒र्मदा॑य मरुतः समन्यवः॥

इन्ध॑न्वऽभिः । धे॒नुऽभिः॑ । र॒प्शदू॑धऽभिः । अ॒ध्व॒स्मऽभिः॑ । प॒थिऽभिः॑ । भ्रा॒ज॒त्ऽऋ॒ष्ट॒यः॒ । आ । हं॒सासः॑ । न । स्वस॑राणि । ग॒न्त॒न॒ । मधोः॑ । मदा॑य । म॒रु॒तः॒ । स॒ऽम॒न्य॒वः॒ ॥

Mantra without Swara
इन्धन्वभिर्धेनुभी रप्शदूधभिरध्वस्मभिः पथिभिर्भ्राजदृष्टयः। आ हंसासो न स्वसराणि गन्तन मधोर्मदाय मरुतः समन्यवः॥

इन्धन्वऽभिः। धेनुऽभिः। रप्शदूधऽभिः। अध्वस्मऽभिः। पथिऽभिः। भ्राजत्ऽऋष्टयः। आ। हंसासः। न। स्वसराणि। गन्तन। मधोः। मदाय। मरुतः। सऽमन्यवः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (भ्राजदृष्टयः) प्रकाश को प्राप्त हुए (समन्यवः) क्रोधों के साथ वर्त्तमान (मरुतः) मरणधर्मा तुमलोग (इन्धन्वभिः) प्रदीप्त करनेवाली (धेनुभिः) वाणियों से वा (रप्शदूधभिः) प्रकट शब्दरूपी धनों से (अध्वभिः) जो कि ध्वस्त नष्ट न हुए उन (पथिभिः) मार्गों से (हंसासः) हंसों के (न) समान (मधोः) मधुर सम्बन्धी (मदाय) हर्ष के लिये (स्वसराणि) दिनों को (आ,गन्तन) आओ प्राप्त होओ ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे आकाशमार्ग से हंस अभीष्ट स्थानों को सुख से जाते हैं, वैसे सुशिक्षित वाणी से विद्यामार्गों को और धर्मपथों से सुखों को नित्य तुम लोग प्राप्त होओ ॥५॥
Subject
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।