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Rigveda Mandal 2 / Sukta 34 / Mantra 4

43 Sukta
15 Mantra
2/34/4
Devata- मरुतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
पृ॒क्षे ता विश्वा॒ भुव॑ना ववक्षिरे मि॒त्राय॑ वा॒ सद॒मा जी॒रदा॑नवः। पृष॑दश्वासो अनव॒भ्ररा॑धस ऋजि॒प्यासो॒ न व॒युने॑षु धू॒र्षदः॑॥

पृ॒क्षे । ता । विश्वा॑ । भुव॑ना । व॒व॒क्षि॒रे॒ । मि॒त्राय॑ । वा॒ । सद॑म् । आ । जी॒रऽदा॑नवः । पृष॑त्ऽअश्वासः । अ॒न॒व॒भ्रऽरा॑धसः । ऋ॒जि॒प्यासः॑ । न । व॒युने॑षु । धूःऽसदः॑ ॥

Mantra without Swara
पृक्षे ता विश्वा भुवना ववक्षिरे मित्राय वा सदमा जीरदानवः। पृषदश्वासो अनवभ्रराधस ऋजिप्यासो न वयुनेषु धूर्षदः॥

पृक्षे। ता। विश्वा। भुवना। ववक्षिरे। मित्राय। वा। सदम्। आ। जीरऽदानवः। पृषत्ऽअश्वासः। अनवभ्रऽराधसः। ऋजिप्यासः। न। वयुनेषु। धूःऽसदः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(जीरदानवः) साधारण जीव वा (पृषदश्वासः) स्थूल अश्व जिन्होंने सींचे वा (अनवभ्रराधसः) जिनका धन नीचे नहीं गिरा वा (धूर्षदः) जो धुर पर स्थिर होनेवाले (जिप्यासः) वा जो कोमलपन को बढ़ाते हैं (न) उनके समान (मित्राय) मित्र के लिये (वा) अथवा जिस कारण इसके लिये (पृक्षे) जलादिकों से सींचे हुए पृथ्वी मण्डल पर जो (विश्वा) समस्त (भुवना) लोकलोकान्तर (सदम्) वा स्थान (आ,ववक्षिरे) अच्छे प्रकार रोष को प्राप्त हों (ता) वे (वयुनेषु) उत्तम ज्ञानों में बढ़ते हैं ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो दुष्टों के लिये क्रोध करते वा श्रेष्ठों को आनन्द देते हैं, वे बुद्धिमान् होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।