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Rigveda Mandal 2 / Sukta 34 / Mantra 3

43 Sukta
15 Mantra
2/34/3
Devata- मरुतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उ॒क्षन्ते॒ अश्वाँ॒ अत्याँ॑इवा॒जिषु॑ न॒दस्य॒ कर्णै॑स्तुरयन्त आ॒शुभिः॑। हिर॑ण्यशिप्रा मरुतो॒ दवि॑ध्वतः पृ॒क्षं या॑थ॒ पृष॑तीभिः समन्यवः॥

उ॒क्षन्ते॑ । अश्वा॑न् । अत्या॑न्ऽइव । आ॒जिषु॑ । न॒दस्य॑ । कर्णैः॑ । तु॒र॒य॒न्ते॒ । आ॒शुऽभिः॑ । हिर॑ण्यऽशिप्राः । म॒रु॒तः॒ । दवि॑ध्वतः । पृ॒क्षम् । या॒थ॒ । पृष॑तीभिः । स॒ऽम॒न्य॒वः॒ ॥

Mantra without Swara
उक्षन्ते अश्वाँ अत्याँइवाजिषु नदस्य कर्णैस्तुरयन्त आशुभिः। हिरण्यशिप्रा मरुतो दविध्वतः पृक्षं याथ पृषतीभिः समन्यवः॥

उक्षन्ते। अश्वान्। अत्यान्ऽइव। आजिषु। नदस्य। कर्णैः। तुरयन्ते। आशुऽभिः। हिरण्यऽशिप्राः। मरुतः। दविध्वतः। पृक्षम्। याथ। पृषतीभिः। सऽमन्यवः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (समन्यवः) क्रोध में भरे (मरुतः) मनुष्यों जैसे (अश्वान्) घोड़ों को (अत्यान्) निरन्तर चलने वाल घोड़ों के समान वा (आजिषु) संग्रामों में (नदस्य) जल से पूर्ण बड़े जलाशय के बीच (कर्णैः) नौकाओं के चलानेवालों के समान (आशुभिः) शीघ्र चलनेवाले घोड़ों के साथ (तुरयन्ते) शीघ्र चलाते हैं वा (हिरण्यशिप्राः) सुवर्ण के सदृश मुखवाले (दविध्वतः) दुष्टों को कंपाते हुए (पृषतीभिः) पवन की गतियों के समान गतियों से युक्त धाराओं से (पृक्षम्) सींचने योग्य को (उक्षन्ते) सींचते हैं वैसे इस व्यवहार को तुम लोग प्राप्त होओ ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शिक्षा करनेवाले जन घोड़ों को वा केवट नाव को उत्तम रीति पर चलाते हैं, वैसे राजजन अपनी सेना को पहुँचावें ॥३॥
Subject
अब राज विषय को अगले मन्त्र में कहा है।