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Rigveda Mandal 2 / Sukta 34 / Mantra 14

43 Sukta
15 Mantra
2/34/14
Devata- मरुतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ताँ इ॑या॒नो महि॒ वरू॑थमू॒तय॒ उप॒ घेदे॒ना नम॑सा गृणीमसि। त्रि॒तो न यान्पञ्च॒ होतॄ॑न॒भिष्ट॑य आव॒वर्त॒दव॑राञ्च॒क्रियाव॑से॥

तान् । इ॒या॒नः । महि॑ । वरू॑थम् । ऊ॒तये॑ । उप॑ । घ॒ । इत् । ए॒ना । नम॑सा । गृ॒णी॒म॒सि॒ । त्रि॒तः । न । यान् । पञ्च॑ । होतृ॑ॠन् । अ॒भिष्ट॑ये । आ॒ऽव॒वर्त॑त् । अव॑रान् । च॒क्रिया॑ । अव॑से ॥

Mantra without Swara
ताँ इयानो महि वरूथमूतय उप घेदेना नमसा गृणीमसि। त्रितो न यान्पञ्च होतॄनभिष्टय आववर्तदवराञ्चक्रियावसे॥

तान्। इयानः। महि। वरूथम्। ऊतये। उप। घ। इत्। एना। नमसा। गृणीमसि। त्रितः। न। यान्। पञ्च। होतॄन्। अभिष्टये। आऽववर्तत्। अवरान्। चक्रिया। अवसे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हम लोग (अभिष्टये) अभीष्ट सुख की (ऊतये) रक्षा आदि के अर्थ (इयानः) प्राप्त होता हुआ कोई जन (त्रितः) जो शरीर और आत्मा सम्बन्धी सुख को विस्तृत है उसके (न) समान (यान्) जिन (पञ्च) पाञ्च (अवरान्) अर्वाचीन (होतॄन्) ग्रहण करनेवालों को और पाँच अर्वाचीन (चक्रिया) चाक के समान वर्त्तमानों को अभीष्ट सुख वा (अवसे) कामना के लिये (आववर्त्तत्) सब ओर से वर्त्तता है (तान्) उनको (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (महि) बड़े (वरूथम्) श्रेष्ठ घर को प्राप्त हो (घ,इत्) ही निश्चय कर (एना) इस (नमसा) नमस्कार से (उप,गृणीमसि) उपस्तुत करते हैं अर्थात् उनकी अतिनिकटस्थ ही स्तुति करते हैं ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कर्मोपासना और ज्ञान विद्या का जाननेवाला अगले-पिछले पवनों को जानकर अपनी और दूसरों की रक्षा के लिये वर्त्तमान है, वैसे हम लोग प्रवृत्त हों ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।