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Rigveda Mandal 2 / Sukta 34 / Mantra 12

43 Sukta
15 Mantra
2/34/12
Devata- मरुतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ते दश॑ग्वाः प्रथ॒मा य॒ज्ञमू॑हिरे॒ ते नो॑ हिन्वन्तू॒षसो॒ व्यु॑ष्टिषु। उ॒षा न रा॒मीर॑रु॒णैरपो॑र्णुते म॒हो ज्योति॑षा शुच॒ता गोअ॑र्णसा॥

ते । दश॑ऽग्वाः । प्र॒थ॒माः । य॒ज्ञम् । ऊ॒हि॒रे॒ । ते । नः॒ । हि॒न्व॒न्तु॒ । उ॒षसः॑ । विऽउ॑ष्टिषु । उ॒षाः । न । रा॒मीः । अ॒रु॒णैः । अप॑ । ऊ॒र्णु॒ते॒ । म॒हः । ज्योति॑षा । शु॒च॒ता । गोऽअ॑र्णसा ॥

Mantra without Swara
ते दशग्वाः प्रथमा यज्ञमूहिरे ते नो हिन्वन्तूषसो व्युष्टिषु। उषा न रामीररुणैरपोर्णुते महो ज्योतिषा शुचता गोअर्णसा॥

ते। दशऽग्वाः। प्रथमाः। यज्ञम्। ऊहिरे। ते। नः। हिन्वन्तु। उषसः। विऽउष्टिषु। उषाः। न। रामीः। अरुणैः। अप। ऊर्णुते। महः। ज्योतिषा। शुचता। गोऽअर्णसा॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 2

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Meaning
जो (दशग्वाः) दशों इन्द्रियों से सिद्धि को प्राप्त होते हैं वे (प्रथमाः) बहुत विस्तारयुक्त बुद्धिवाले मुख्य विद्वान् जन (यज्ञम्) यज्ञ को (ऊहिरे) प्राप्त होते हैं (ते) वे (उषसः) प्रभातकाल के (व्युष्टिषु) प्रतापों में (नः) हमलोगों को (हिन्वन्तु) बढ़ावें जो (अरुणैः) लाल वर्णों से (महः) बड़े (गोअर्णसा) जिसमें कि किरण और प्रकाश विद्यमान (शुचता) जो पवित्र वा पवित्रता है उस (ज्योतिषा) प्रकाश से (रामीः) आराम की देनेवाली रात्रियों को (उषाः) प्रभात समय के (न) समान (अप,ऊर्णुते) न ढाँपते अर्थात् प्रकट करते हैं (ते) वे हमारे शिक्षक हों ॥१२॥
Essence
जो क्रियाकाण्ड में कुशल जितेन्द्रिय जन प्रभातकाल के समान अविन्द्यान्धकार की निवृत्ति करनेवाले मनुष्यों को विद्या और उत्तम शिक्षा से बढ़ाते हैं, वे सबको सत्कार करने योग्य हैं ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।