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Rigveda Mandal 2 / Sukta 34 / Mantra 1

43 Sukta
15 Mantra
2/34/1
Devata- मरुतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
धा॒रा॒व॒रा म॒रुतो॑ धृ॒ष्ण्वो॑जसो मृ॒गा न भी॒मास्तवि॑षीभिर॒र्चिनः॑। अ॒ग्नयो॒ न शु॑शुचा॒ना ऋ॑जी॒षिणो॒ भृमिं॒ धम॑न्तो॒ अप॒ गा अ॑वृण्वत॥

धा॒रा॒व॒राः । म॒रुतः॑ । घृ॒ष्णुऽओ॑जसः । मृ॒गाः । न । भी॒माः । तवि॑षीभिः । अ॒र्चिनः॑ । अ॒ग्नयः॑ । न । शु॒शु॒चा॒नाः । ऋ॒जी॒षिणः॑ । भृमि॑म् । धम॑न्तः । अप॑ । गाः । अ॒वृ॒ण्व॒त॒ ॥

Mantra without Swara
धारावरा मरुतो धृष्ण्वोजसो मृगा न भीमास्तविषीभिरर्चिनः। अग्नयो न शुशुचाना ऋजीषिणो भृमिं धमन्तो अप गा अवृण्वत॥

धारावराः। मरुतः। घृष्णुऽओजसः। मृगाः। न। भीमाः। तविषीभिः। अर्चिनः। अग्नयः। न। शुशुचानाः। ऋजीषिणः। भृमिम्। धमन्तः। अप। गाः। अवृण्वत॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो (धारावराः) धाराप्रवाह शिक्षित वाणियों के बीच न्यून जिनकी वाणी (मरुतः) वे मरणधर्मयुक्त (भीमाः) दुष्टों के प्रति भयंकर (मृगाः) सिंहों के (न) समान (धृष्ण्वोजसः) पराक्रम को धारण किये हुए (शुशुचानाः) शुद्ध वा शोधनेवाले (अग्नयः) पावक अग्नियों के (न) समान (तविषीभिः) बलयुक्त सेनाओं से (अर्चिनः) सत्कार करनेवाले (जीषिणः) कोमल स्वभावी मनुष्य (भृमिम्) अनवस्था को (अप,धमन्तः) दूर करते हुए आप (गाः) सुशिक्षित वाणियों को (अवृण्वत) स्वीकार करें ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पावक के समान पवित्र, जल के समान कोमल, सिंह के समान पराक्रम करनेवाले, वायु के समान बलिष्ठ होकर अन्याय को निवृत्त करें, वे समस्त सुखको प्राप्त हों ॥१॥
Subject
अब पन्द्रह चावाले चौंतीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों के विषय का वर्णन करते हैं।