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Rigveda Mandal 2 / Sukta 33 / Mantra 8

43 Sukta
15 Mantra
2/33/8
Devata- रुद्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र ब॒भ्रवे॑ वृष॒भाय॑ श्विती॒चे म॒हो म॒हीं सु॑ष्टु॒तिमी॑रयामि। न॒म॒स्या क॑ल्मली॒किनं॒ नमो॑भिर्गृणी॒मसि॑ त्वे॒षं रु॒द्रस्य॒ नाम॑॥

प्र । ब॒भ्रवे॑ । वृ॒ष॒भाय॑ । श्वि॒ती॒चे । म॒हः । म॒हीम् । सु॒ऽस्तु॒तिम् । ई॒र॒या॒मि॒ । न॒म॒स्य । क॒ल्म॒ली॒किन॑म् । नमः॑ऽभिः । गृ॒णी॒मसि॑ । त्वे॒षम् । रु॒द्रस्य॑ । नाम॑ ॥

Mantra without Swara
प्र बभ्रवे वृषभाय श्वितीचे महो महीं सुष्टुतिमीरयामि। नमस्या कल्मलीकिनं नमोभिर्गृणीमसि त्वेषं रुद्रस्य नाम॥

प्र। बभ्रवे। वृषभाय। श्वितीचे। महः। महीम्। सुऽस्तुतिम्। ईरयामि। नमस्य। कल्मलीकिनम्। नमःऽभिः। गृणीमसि। त्वेषम्। रुद्रस्य। नाम॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 17 Mantra » 3

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Meaning
हे वैद्य जिस (वृषभाय) श्रेष्ठ (बभ्रवे) धारण करनेवाले (महः) बड़े (श्वितीचे) आवरण को प्राप्त होते हुए वैद्य के लिये (महीम्) बड़ी (सुष्टुतिम्) सुन्दर स्तुति की (प्र,ईरयामि) प्रेरणा देता हूँ, सो आप मुझे (नमस्य) नमिये जिस (रुद्रस्य) अच्छे वैद्य का (कल्मलीकिनम्) देदीप्यमान (त्वेषम्) प्रकाशमान (नाम) नाम है उसकी हम लोग (नमोभिः) सत्कारों से (गृणीमसि) प्रशंसा करते हैं ॥८॥
Essence
विद्यार्थियों की योग्यता है जो कि विद्या ग्रहण करावे, उसका सदा सत्कार करें, जिसकी वैद्यकशास्त्र में प्रसिद्धि है, उसी से वैद्यविद्या का अध्ययन करना चाहिये ॥८॥
Subject
फिर उसी विषयको अगले मन्त्र में कहा है।

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