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Rigveda Mandal 2 / Sukta 33 / Mantra 5

43 Sukta
15 Mantra
2/33/5
Devata- रुद्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हवी॑मभि॒र्हव॑ते॒ यो ह॒विर्भि॒रव॒ स्तोमे॑भी रु॒द्रं दि॑षीय। ऋ॒दू॒दरः॑ सु॒हवो॒ मा नो॑ अ॒स्यै ब॒भ्रुः सु॒शिप्रो॑ रीरधन्म॒नायै॑॥

हवी॑मऽभिः । हव॑ते । यः । ह॒विःऽभिः । अव॑ । स्तोमे॑भिः । रु॒द्रम् । दि॒षी॒य॒ । ऋ॒दू॒दरः॑ । सु॒ऽहवः॑ । मा । नः॒ । अ॒स्यै । ब॒भ्रुः । सु॒ऽशिप्रः॑ । री॒र॒ध॒त् । म॒नायै॑ ॥

Mantra without Swara
हवीमभिर्हवते यो हविर्भिरव स्तोमेभी रुद्रं दिषीय। ऋदूदरः सुहवो मा नो अस्यै बभ्रुः सुशिप्रो रीरधन्मनायै॥

हवीमऽभिः। हवते। यः। हविःऽभिः। अव। स्तोमेभिः। रुद्रम्। दिषीय। ऋदूदरः। सुऽहवः। मा। नः। अस्यै। बभ्रुः। सुऽशिप्रः। रीरधत्। मनायै॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो वैद्यजन (हवीमभिः) सुन्दर ओषधियों के देने से हम लोगों की (हवते) स्पर्द्धा करता है उस (रुद्रम्) वैद्य को मैं (हविर्भिः) ग्रहण करने योग्य (स्तोमेभिः) श्लाघाओं से (अव,दिषीय) न खण्डन करूँ अर्थात् न उसे क्लेश देऊँ जिससे (सुहवः) सुन्दरदानशील (दूदरः) कोमल उदरवाला (बभ्रुः) पालनकर्त्ता (सुशिप्रः) सुन्दर मुखयुक्त वैद्य (नः) हमारी (अस्यै) इस (मनायै) माननेवाली बुद्धि के लिये (मा,रीरधत्) मत हिंसा कर ॥५॥
Essence
जो वैद्य जन रोगनिवारण से हमारी बुद्धि को बढ़ाते हैं, उनके साथ हम लोग कभी न विरोध करें ॥५॥
Subject
फिर वैद्य विषयको अगले मन्त्र में कहा है।