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Rigveda Mandal 2 / Sukta 33 / Mantra 4

43 Sukta
15 Mantra
2/33/4
Devata- रुद्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा त्वा॑ रुद्र चुक्रुधामा॒ नमो॑भि॒र्मा दुष्टु॑ती वृषभ॒ मा सहू॑ती। उन्नो॑ वी॒राँ अ॑र्पय भेष॒जेभि॑र्भि॒षक्त॑मं त्वा भि॒षजां॑ शृणोमि॥

मा । त्वा॒ । रु॒द्र॒ । चु॒क्रु॒धा॒म॒ । नमः॑ऽभिः । मा । दुःऽस्तु॑ती । वृ॒ष॒भ॒ । मा । सऽहू॑ती । उत् । नः॒ । वी॒रान् । अ॒र्प॒य॒ । भे॒ष॒जेभिः॑ । भि॒षक्ऽत॑मम् । त्वा॒ । भि॒षजा॑म् । शृ॒णो॒मि॒ ॥

Mantra without Swara
मा त्वा रुद्र चुक्रुधामा नमोभिर्मा दुष्टुती वृषभ मा सहूती। उन्नो वीराँ अर्पय भेषजेभिर्भिषक्तमं त्वा भिषजां शृणोमि॥

मा। त्वा। रुद्र। चुक्रुधाम। नमःऽभिः। मा। दुःऽस्तुती। वृषभ। मा। सऽहूती। उत्। नः। वीरान्। अर्पय। भेषजेभिः। भिषक्ऽतमम्। त्वा। भिषजाम्। शृणोमि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषभ) श्रेष्ठ (इन्द्र) कुपथ्यकारियों को रुलानेवाले ! हम लोग (दुष्टुती) दुष्ट स्तुति से (त्वा) आपके (प्रति) प्रति (मा) मत (चुक्रुधाम) क्रोध करें (सहूती) समान स्पर्द्धा से (मा) मत क्रोध करें आपके साथ विरोध (मा) मत करें किन्तु (नमोभिः) सत्कार के साथ निरन्तर सत्कार करें, जिन (त्वा) आपको मैं (भिषजाम्) वैद्यों के बीच (भिषक्तमम्) वैद्यों के शिरोमणि (शृणोमि) सुनता हूँ सो आप (वीरान्) वीर नीरोग पुत्रादिकों को (उत्,अर्पण) उत्तमता से सौपें ॥४॥
Essence
किसी को वैद्य के साथ विरोध कभी न करना चाहिये न इसके साथ ईर्ष्या करनी चाहिये किन्तु प्रीति के साथ सर्वोत्तम वैद्य की सेवा करनी चाहिये, जिससे रोगों से अलग होकर सुख निरन्तर बढ़े ॥४॥
Subject
फिर वैद्यक विषय को अगले मन्त्र में कहा है।