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Rigveda Mandal 2 / Sukta 33 / Mantra 14

43 Sukta
15 Mantra
2/33/14
Devata- रुद्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परि॑ णो हे॒ती रु॒द्रस्य॑ वृज्याः॒ परि॑ त्वे॒षस्य॑ दुर्म॒तिर्म॒ही गा॑त्। अव॑ स्थि॒रा म॒घव॑द्भ्यस्तनुष्व॒ मीढ्व॑स्तो॒काय॒ तन॑याय मृळ॥

परि॑ । नः॒ । हे॒तिः । रु॒द्रस्य॑ । वृ॒ज्याः॒ । परि॑ । त्वे॒षस्य॑ । दुःऽम॒तिः । म॒ही । गा॒त् । अव॑ । स्थि॒रा । म॒घव॑त्ऽभ्यः । त॒नु॒ष्व॒ । मीढ्वः॑ । तो॒काय॑ । तन॑याय । मृ॒ळ॒ ॥

Mantra without Swara
परि णो हेती रुद्रस्य वृज्याः परि त्वेषस्य दुर्मतिर्मही गात्। अव स्थिरा मघवद्भ्यस्तनुष्व मीढ्वस्तोकाय तनयाय मृळ॥

परि। नः। हेतिः। रुद्रस्य। वृज्याः। परि। त्वेषस्य। दुःऽमतिः। मही। गात्। अव। स्थिरा। मघवत्ऽभ्यः। तनुष्व। मीढ्वः। तोकाय। तनयाय। मृळ॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 4

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Meaning
हे (मीढ्वः) सुखों से सींचनेवाले वैद्य जो (रुद्रस्य) दुःख देनेवाले रोगको (हेतिः) वज्र से पीड़ा के समान वा (वृज्याः) वर्जने योग्य पीड़ा और (त्वेषस्य) प्रदीप्त अर्थात् प्रबल की (दुर्मतिः) दुष्टमति (नः) हमलोगों को (परि) सब ओर से प्राप्त होवे, तथा जो (मघवद्भ्यः) प्रशंसित धनवालों से (मही) प्रशंसनीय वाणी हम लोगों को सब ओर से शीघ्र उत्पन्न हुए सन्तान के लिये (तनयाय) जोकि कुमारावस्था को प्राप्त है उसके लिये विस्तारो, और उनसे सबको (मृळ) सुखी करो और रोगों को (अव,तनुष्व) दूर करो ॥१४॥
Essence
मनुष्यों को उत्तम शिक्षा से दुष्टमति को तथा वैद्यक रीति से सब रोगों का निवारण कर अपने कुल को सदा सुखी करना चाहिये ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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