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Rigveda Mandal 2 / Sukta 33 / Mantra 13

43 Sukta
15 Mantra
2/33/13
Devata- रुद्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
या वो॑ भेष॒जा म॑रुतः॒ शुची॑नि॒ या शंत॑मा वृषणो॒ या म॑यो॒भु। यानि॒ मनु॒रवृ॑णीता पि॒ता न॒स्ता शं च॒ योश्च॑ रु॒द्रस्य॑ वश्मि॥

या । वः॒ । भे॒ष॒जा । म॒रु॒तः॒ । शुची॑नि । या । शम्ऽत॑मा । वृ॒ष॒णः॒ । या । म॒यः॒ऽभु । यानि॑ । मनुः॑ । अवृ॑णीत । पि॒ता । नः॒ । ता । शम् । च॒ । योः । च॒ । रु॒द्रस्य॑ । व॒श्मि॒ ॥

Mantra without Swara
या वो भेषजा मरुतः शुचीनि या शंतमा वृषणो या मयोभु। यानि मनुरवृणीता पिता नस्ता शं च योश्च रुद्रस्य वश्मि॥

या। वः। भेषजा। मरुतः। शुचीनि। या। शम्ऽतमा। वृषणः। या। मयःऽभु। यानि। मनुः। अवृणीत। पिता। नः। ता। शम्। च। योः। च। रुद्रस्य। वश्मि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषणः) वृष्टि करानेवाले विद्वानों ! जैसे (मरुतः) मनुष्यों को और (या) जिन (शुचीनि) शुद्ध वा (या) जिन (शन्तमा) अतीव सुख करने वा (या) जिन (मयोभु) सुख की भावना देने वा (यानि) जिन रोग निवारनेवाली (भेषजा) औषधों को (वः) तुम्हारे लिये (मनुः) वैद्यविद्या जाननेवाला (पिता) पिता (अवृणीत) स्वीकार करता है वह तुम्हारे (नश्च) और हमारे लिये (योः) त्याग करने (रुद्रस्य) और रुलानेवाले रोग की निवृत्ति के लिये (शं,च) और कल्याण की भावना के लिये होती वैसी मैं (वश्मि) कामना करूँ ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि पिता और पितामहों तथा अध्यापक वा अन्य विद्वानों से प्रतिरोग के निवारण के अर्थ ओषधियों को जानकर अपने और दूसरों के रोगों को निवारण करके सबके लिये सुख की आकांक्षा करें ॥१३॥
Subject
फिर वैद्यक विषयको अगले मन्त्र में कहा है।