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Rigveda Mandal 2 / Sukta 32 / Mantra 6

43 Sukta
8 Mantra
2/32/6
Devata- सिनीवाली Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सिनी॑वालि॒ पृथु॑ष्टुके॒ या दे॒वाना॒मसि॒ स्वसा॑। जु॒षस्व॑ ह॒व्यमाहु॑तं प्र॒जां दे॑वि दिदिड्ढि नः॥

सिनी॑वालि । पृथु॑ऽस्तुके । या । दे॒वाना॑म् । असि॑ । स्वसा॑ । जु॒षस्व॑ । ह॒व्यम् । आऽहु॑तम् । प्र॒ऽजाम् । दे॒वि॒ । दि॒दि॒ड्ढि॒ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा। जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्ढि नः॥

सिनीवालि। पृथुऽस्तुके। या। देवानाम्। असि। स्वसा। जुषस्व। हव्यम्। आऽहुतम्। प्रऽजाम्। देवि। दिदिड्ढि। नः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पृथुष्टुके) मोटी-मोटी जंघाओंवाली (सिनीवालि) जो अतिप्रेम से युक्त तू (देवानाम्) विद्वानों की (स्वसा) बहिन (असि) है सो तू मैंने जो (आहुतम्) सब ओर से होमा है उस (हव्यम्) देने योग्य द्रव्य को (जुषस्व) प्रीति से सेवन कर, हे (देवि) कामना करती हुई स्त्री तू हमारी (प्रजाम्) प्रजा को (दिदिड्ढि) देओ ॥६॥
Essence
जो विद्वानों के कुल की कन्या विद्वानों की बन्धु ब्रह्मचर्य से विद्या को प्राप्त हुई प्रकाशमान हो उसे पत्नी कर विधि से इसमें सन्तानों को जो उत्पन्न करे, वह पुरुष और वह स्त्री दोनों सुखी हों ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।