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Rigveda Mandal 2 / Sukta 32 / Mantra 1

43 Sukta
8 Mantra
2/32/1
Devata- द्यावापृथिव्यौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒स्य मे॑ द्यावापृथिवी ऋताय॒तो भू॒तम॑वि॒त्री वच॑सः॒ सिषा॑सतः। ययो॒रायुः॑ प्रत॒रं ते इ॒दं पु॒र उप॑स्तुते वसू॒युर्वां॑ म॒हो द॑धे॥

अ॒स्य । मे॒ । द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । ऋ॒त॒ऽय॒तः । भू॒तम् । अ॒वि॒त्री इति॑ । वच॑सः । सिसा॑सतः । ययोः॑ । आयुः॑ । प्र॒ऽत॒रम् । ते॒ इति॑ । इ॒दम् । पु॒रः । उप॑स्तुते॒ इत्युप॑ऽस्तुते । व॒सु॒ऽयुः । वा॒ । म॒हः । द॒धे॒ ॥

Mantra without Swara
अस्य मे द्यावापृथिवी ऋतायतो भूतमवित्री वचसः सिषासतः। ययोरायुः प्रतरं ते इदं पुर उपस्तुते वसूयुर्वां महो दधे॥

अस्य। मे। द्यावापृथिवी इति। ऋतऽयतः। भूतम्। अवित्री इति। वचसः। सिसासतः। ययोः। आयुः। प्रऽतरम्। ते इति। इदम्। पुरः। उपस्तुते इत्युपऽस्तुते। वसुऽयुः। वाम्। महः। दधे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (अवित्री) रक्षा आदि के निमित्त (उपस्तुते) समीप में प्रशंसा को प्राप्त (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि (मे) मेरे (अस्य) इस प्रत्यक्ष (वचसा) वचन के सम्बन्ध से (भूतम्) उत्पन्न हुए (तायतः) जल के समान आचरण करते (सिषासतः) वा अच्छे प्रकार विभाग होने के समान आचरण करते जिनसे (प्रतरम्) पुष्कल (इदम्) इस (आयुः) जीवनको (वसूयुः) धनकी चाहना करता हुआ मैं (पुरः) आगे (दधे) धारण करता हूँ (ते) वे सब जगत् का सुख सिद्ध करते हैं (वाम्) उनकी उत्तेजना से मैं (महः) बहुत सुख को धारण करता हूँ ॥१॥
Essence
मनुष्यों को भूमि और अग्नि का सेवन जो युक्ति के साथ किया जाता है तो पूर्ण आयु और धन की प्राप्ति हो सकती है ॥१॥
Subject
अब बत्तीसवें सूक्त का आरम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र से मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं।