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Rigveda Mandal 2 / Sukta 31 / Mantra 6

43 Sukta
7 Mantra
2/31/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त वः॒ शंस॑मु॒शिजा॑मिव श्म॒स्यहि॑र्बु॒ध्न्यो॒३॒॑ज एक॑पादु॒त। त्रि॒त ऋ॑भु॒क्षाः स॑वि॒ता चनो॑ दधे॒ऽपां नपा॑दाशु॒हेमा॑ धि॒या शमि॑॥

उ॒त । वः॒ । शंस॑म् । उ॒शिजा॑म्ऽइव । श्म॒सि॒ । अहिः॑ । बु॒ध्न्यः॑ । अ॒जः । एक॑ऽपात् । उ॒त । त्रि॒तः । ऋ॒भु॒ऽक्षाः । स॒वि॒ता । चनः॑ । द॒धे॒ । अ॒पाम् । नपा॑त् । आ॒शु॒ऽहेमा॑ । धि॒या । शमि॑ ॥

Mantra without Swara
उत वः शंसमुशिजामिव श्मस्यहिर्बुध्न्यो३ज एकपादुत। त्रित ऋभुक्षाः सविता चनो दधेऽपां नपादाशुहेमा धिया शमि॥

उत। वः। शंसम्। उशिजाम्ऽइव। श्मसि। अहिः। बुध्न्यः। अजः। एकऽपात्। उत। त्रितः। ऋभुऽक्षाः। सविता। चनः। दधे। अपाम्। नपात्। आशुऽहेमा। धिया। शमि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 14 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जैसे (त्रितः) ब्रह्मचर्य अध्ययन और विचार इन तीन कर्मों से (भुक्षा) मेधावी (सविता) ऐश्वर्य्य करनेहारा (नपात्) न गिरनेवाला वा पग आदि अवयवों से रहित (आशुहेमा) शीघ्र बढ़नेवाला (उत) और (अजः) कभी न उत्पन्न होनेवाला (एकपात्) एकप्रकार की प्राप्तियुक्त (अहिः) व्याप्तिशील (बुध्न्यः) अन्तरिक्ष में व्याप्त मेघ के तुल्य वर्त्तमान मैं (धिया) बुद्धि वा कर्म से (शमि) कर्म में प्रवृत्त होऊँ (अपाम्) प्राणों के (चनः) अन्न को (दधे) धारण करता हूँ वैसे हे पत्नी तू प्रवृत्त हो, जैसे हम (अशितामिव) कामना के योग्य (वः) तुम विद्वानों की (शंसम्) स्तुति को (श्मसि) चाहते हैं (उत) और तुमको धारण करें, वैसे तुमलोग भी हमारे विषय में वर्त्तो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे ईश्वर अजन्मा कामना के योग्य सत्य गुणकर्मस्वभाववाला सेवने योग्य है, वैसे हम सब जीव लोग हैं, इससे ब्रह्मचर्यादि शुभ कर्म में हमको सदा वर्त्तना चाहिये ॥६॥
Subject
फिर हम मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।