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Rigveda Mandal 2 / Sukta 31 / Mantra 5

43 Sukta
7 Mantra
2/31/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उ॒त त्ये दे॒वी सु॒भगे॑ मिथू॒दृशो॒षासा॒नक्ता॒ जग॑तामपी॒जुवा॑। स्तु॒षे यद्वां॑ पृथिवि॒ नव्य॑सा॒ वचः॑ स्था॒तुश्च॒ वय॒स्त्रिव॑या उप॒स्तिरे॑॥

उ॒त । त्ये । दे॒वी इति॑ । सु॒भगे॒ इति॑ सु॒ऽभगे॑ । मिथु॒ऽदृशा॑ । उ॒षसा॒नक्ता॑ । जग॑ताम् । अ॒पि॒ऽजुवा॑ । स्तु॒षे । यत् । वा॒म् । पृ॒थि॒वि॒ । नव्य॑सा । वचः॑ । स्था॒तुः । च॒ । वयः॑ । त्रिऽव॑याः । उ॒प॒ऽस्तिरे॑ ॥

Mantra without Swara
उत त्ये देवी सुभगे मिथूदृशोषासानक्ता जगतामपीजुवा। स्तुषे यद्वां पृथिवि नव्यसा वचः स्थातुश्च वयस्त्रिवया उपस्तिरे॥

उत। त्ये। देवी इति। सुभगे इति सुऽभगे। मिथुऽदृशा। उषसानक्ता। जगताम्। अपिऽजुवा। स्तुषे। यत्। वाम्। पृथिवि। नव्यसा। वचः। स्थातुः। च। वयः। त्रिऽवयाः। उपऽस्तिरे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 14 Mantra » 5

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Meaning
हे (पृथिवि) पृथिवी के तुल्य वर्त्तमान सहनशील स्त्री (त्रिवयाः) तीनों अवस्था भोगनेवाली तू जैसे (त्ये) वे (मिथूदृशा) आपस में एक-दूसरे को देखनेवाले (सुभगे) सुन्दर ऐश्वर्य के निमित्त (देवी) प्रकाशमान (अपीजुवा) प्रेरक (उषसानक्ता) दिन-रात (जगताम्) संसारस्थ मनुष्यादि (च) और (स्थातुः) स्थावर वृक्षादि के पालक होते हैं (उत) और जैसे मैं (नव्यसा) नवीन (वचः) वचन से (वयः) अभीष्ट अवस्था को (यत्) जिनकी (स्तुषे) स्तुति करता हूँ और (उपस्तिरे) निकट आच्छादित रक्षित करता हूँ वैसे ही (वाम्) उनकी स्तुति कर ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रात-दिन परस्पर मिले हुए वर्त्तते हैं, वैसे ही स्त्री-पुरुष वर्त्तें। जैसे पुरुष ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के सब पदार्थों के गुण-कर्म-स्वभावों को जानकर विद्वान् होते हैं, वैसे ही स्त्रियाँ भी हों ॥५॥
Subject
फिर स्त्रीपुरुष के कर्त्तव्य विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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