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Rigveda Mandal 2 / Sukta 31 / Mantra 4

43 Sukta
7 Mantra
2/31/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उ॒त स्य दे॒वो भुव॑नस्य स॒क्षणि॒स्त्वष्टा॒ ग्नाभिः॑ स॒जोषा॑ जूजुव॒द्रथ॑म्। इळा॒ भगो॑ बृहद्दि॒वोत रोद॑सी पू॒षा पुरं॑धिर॒श्विना॒वधा॒ पती॑॥

उ॒त । स्यः । दे॒वः । भुव॑नस्य । स॒क्षणिः॑ । त्वष्टा॑ । ग्नाभिः॑ । स॒ऽजोषाः॑ । जू॒जु॒व॒त् । रथ॑म् । इळा॑ । भगः॑ । बृ॒ह॒त्ऽदि॒वा । उ॒त । रोद॑सी॒ इति॑ । पू॒षा । पुर॑म्ऽधिः । अ॒श्विनौ॑ । अध॑ । पती॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
उत स्य देवो भुवनस्य सक्षणिस्त्वष्टा ग्नाभिः सजोषा जूजुवद्रथम्। इळा भगो बृहद्दिवोत रोदसी पूषा पुरंधिरश्विनावधा पती॥

उत। स्यः। देवः। भुवनस्य। सक्षणिः। त्वष्टा। ग्नाभिः। सऽजोषाः। जूजुवत्। रथम्। इळा। भगः। बृहत्ऽदिवा। उत। रोदसी इति। पूषा। पुरम्ऽधिः। अश्विनौ। अध। पती इति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 14 Mantra » 4

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Meaning
जो (पूषा) पुष्टिकारक (पुरन्धिः) पुरों का धारण करनेवाला (सक्षणिः) मेली (सजोषाः) सुख-दुःख और प्रीति को बराबर रखनेवाला (भगः) ऐश्वर्यभागी (देवः) प्रकाशक (पती) पालन करनेहारे (अश्विनौ) सूर्यचन्द्रमा के तुल्य (उत) और (दिवा) प्रकाश के साथ (रोदसी) सूर्य भूमी (भुवनस्य) लोकों के (त्वष्टा) छेदन करनेवाले सूर्य के तुल्य (रथम्) विमानादि यान को (जूजुवत्) पहुँचावे (अध) इसके अनन्तर (उत) और इसकी (ग्नाभिः) वाणियों के साथ (इळा) उत्तम वाणी है (स्यः) वह (बृहत्) बड़े सुख को प्राप्त होवे ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजली के तुल्य और सुशिक्षित वाणी के तुल्य वर्त्तते हैं, वे अनेक शिल्प विद्या से साध्य यानों को बना के ऐश्वर्य्यवाले होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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