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Rigveda Mandal 2 / Sukta 30 / Mantra 9

43 Sukta
11 Mantra
2/30/9
Devata- बृहस्पतिः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो नः॒ सनु॑त्य उ॒त वा॑ जिघ॒त्नुर॑भि॒ख्याय॒ तं ति॑गि॒तेन॑ विध्य। बृह॑स्पत॒ आयु॑धैर्जेषि॒ शत्रू॑न्द्रु॒हे रीष॑न्तं॒ परि॑ धेहि राजन्॥

यः । नः॒ । सनु॑त्य । उ॒त । वा॒ । जि॒घ॒त्नुः । अ॒भि॒ऽख्याय॑ । तम् । ति॒गि॒तेन॑ । वि॒ध्य॒ । बृह॑स्पते । आयु॑धैः । जे॒षि॒ । शत्रू॑न् । दु॒हे । रिष॑न्तम् । परि॑ । धे॒हि॒ । रा॒ज॒न् ॥

Mantra without Swara
यो नः सनुत्य उत वा जिघत्नुरभिख्याय तं तिगितेन विध्य। बृहस्पत आयुधैर्जेषि शत्रून्द्रुहे रीषन्तं परि धेहि राजन्॥

यः। नः। सनुत्य। उत। वा। जिघत्नुः। अभिऽख्याय। तम्। तिगितेन। विध्य। बृहस्पते। आयुधैः। जेषि। शत्रून्। द्रुहे। रिषन्तम्। परि। धेहि। राजन्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (राजन्) प्रकाशमान राजन्! आप (यः) जो (नः) हमारा (सनुत्यः) नम्रादि गुणयुक्त जनों में रहनेवाला (उत,वा) अथवा (जिघत्नुः) मारने की इच्छा करनेवाला है (तम्) उसको (अभिख्याय) सब ओर से प्रकट कर (तिगितेन) प्राप्त हुए शस्त्र से (विध्य) ताड़ना दीजिये, हे (बृहस्पते) बड़े-बड़े विषय के रक्षक जिस कारण आप (आयुधैः) शस्त्र-अस्त्रों से (शत्रून्) शत्रुओं को (जेषि) जीतते हो और (रीषन्तम्) मारते हुए को जीतते हो इससे उनको (द्रुहे) द्रोहकर्त्ता के लिये (परि,धेहि) सब ओर से धारण कीजिये ॥९॥
Essence
प्रजापुरुषों को चाहिये कि अपने दुःखों को राजपुरुषों से निवेदन कर निवृत्त करावें, जो प्रजा की रक्षा में प्रीति से वर्त्तमान हैं, उनको सुख दिलावें और जो हिंसक हैं, उनका निवेदन कर दण्ड दिलावें ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।