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Rigveda Mandal 2 / Sukta 30 / Mantra 5

43 Sukta
11 Mantra
2/30/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अव॑ क्षिप दि॒वो अश्मा॑नमु॒च्चा येन॒ शत्रुं॑ मन्दसा॒नो नि॒जूर्वाः॑। तो॒कस्य॑ सा॒तौ तन॑यस्य॒ भूरे॑र॒स्माँ अ॒र्धं कृ॑णुतादिन्द्र॒ गोना॑म्॥

अव॑ । क्षि॒प॒ । दि॒वः । अश्मा॑नम् । उ॒च्चा । येन॑ । शत्रु॑म् । म॒न्द॒सा॒नः । नि॒ऽजूर्वाः॑ । तो॒कस्य॑ । सा॒तौ । तन॑यस्य । भूरेः॑ । अ॒स्मान् । अ॒र्धम् । कृ॒णु॒ता॒त् । इ॒न्द्र॒ । गोना॑म् ॥

Mantra without Swara
अव क्षिप दिवो अश्मानमुच्चा येन शत्रुं मन्दसानो निजूर्वाः। तोकस्य सातौ तनयस्य भूरेरस्माँ अर्धं कृणुतादिन्द्र गोनाम्॥

अव। क्षिप। दिवः। अश्मानम्। उच्चा। येन। शत्रुम्। मन्दसानः। निऽजूर्वाः। तोकस्य। सातौ। तनयस्य। भूरेः। अस्मान्। अर्धम्। कृणुतात्। इन्द्र। गोनाम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 12 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्य के देनेवाले सभापति राजन्! (मन्दसानः) प्रशंसा को प्राप्त हुए आप (येन) जिस बल से (भूरेः) बहुत प्रकार के (तोकस्य) छोटे सन्तान (तनयस्य) युवा पुत्र के (सातौ) सम्यक् सेवन में (अस्मान्) हमको (गोनाम्) पृथिवी और गौओं की (अर्द्धम्) संपन्नता समृद्धि को (कृणुतात्) कीजिये उस बल से जैसे सूर्य (उच्चा) ऊँचे स्थित बद्दलों और (दिवः) दिव्य आकाश से प्राप्त (अश्मानम्) मेघ को भूमि पर फेंकता है वैसे (शत्रुम्) शत्रु को (अव,क्षिप) दूर पहुँचा और दुष्टों को (निजूर्वाः) निरन्तर मारिये नष्ट कीजिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे अपने सन्तानों के दुःख दूर कर सम्यक् रक्षा कर बढ़ाते हैं, वैसे ही प्रजा के कण्टकों को निवृत्त कर शिष्टों का सम्यक् पालन कर बढ़ावें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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