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Rigveda Mandal 2 / Sukta 30 / Mantra 11

43 Sukta
11 Mantra
2/30/11
Devata- मरूतः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तं वः॒ शर्धं॒ मारु॑तं सुम्न॒युर्गि॒रोप॑ ब्रुवे॒ नम॑सा॒ दैव्यं॒ जन॑म्। यथा॑ र॒यिं सर्व॑वीरं॒ नशा॑महा अपत्य॒साचं॒ श्रुत्यं॑ दि॒वेदि॑वे॥

तम् । वः॒ । शर्ध॑म् । मारु॑तम् । सु॒म्न॒ऽयुः । गि॒रा । उप॑ । ब्रु॒वे॒ । नम॑सा । दैव्य॑म् । जन॑म् । यथा॑ । र॒यिम् । सर्व॑ऽवीरम् । नशा॑महै । अ॒प॒त्य॒ऽसाच॑म् । श्रुत्य॑म् । दि॒वेऽदि॑वे ॥

Mantra without Swara
तं वः शर्धं मारुतं सुम्नयुर्गिरोप ब्रुवे नमसा दैव्यं जनम्। यथा रयिं सर्ववीरं नशामहा अपत्यसाचं श्रुत्यं दिवेदिवे॥

तम्। वः। शर्धम्। मारुतम्। सुम्नऽयुः। गिरा। उप। ब्रुवे। नमसा। दैव्यम्। जनम्। यथा। रयिम्। सर्वऽवीरम्। नशामहै। अपत्यऽसाचम्। श्रुत्यम्। दिवेऽदिवे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो! (यथा) जैसे (सुम्नयुः) अपने को धन की इच्छा करनेवाला मैं (नमसा) सत्काररूप (गिरा) वाणी से (वः) तुम्हारे (तम्) उस (मारुतम्) वायुओं के सम्बन्धी (शर्द्धम्) बलको (दिवेदिवे) प्रतिदिन (दैव्यम्) विद्वानों में प्रसिद्ध हुए (जनम्) जन के प्रति (उप,ब्रुवे) उपदेश करूँ वैसे तुम लोग हमारे बल को सबके प्रति कहा करो, जैसे हम लोग (श्रुत्यम्) सुनने में प्रकट (अपत्यसाचम्) उत्तम सन्तानयुक्त (सर्ववीरम्) जिससे सब वीर पुरुष हों ऐसे (रयिम्) धन को प्राप्त होके पूर्ण अवस्था को भोगके (नशामहै) शरीर छोड़ें, वैसे तुम लोग भी होओ ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे राजपुरुष प्रजा के गुणों को अपने लोगों के प्रति कहें वैसे प्रजा पुरुष राजपुरुषों के गुणों को अपने सब योगियों से कहें, ऐसे परस्पर गुणज्ञानपूर्वक प्रीति को प्राप्त होके नित्य आनन्दित होवें ॥११॥ इस सूक्त में स्त्री-पुरुष और राज प्रजा के गुणों क वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह तीसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।