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Rigveda Mandal 2 / Sukta 30 / Mantra 10

43 Sukta
11 Mantra
2/30/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्माके॑भिः॒ सत्व॑भिः शूर॒ शूरै॑र्वी॒र्या॑ कृधि॒ यानि॑ ते॒ कर्त्वा॑नि। ज्योग॑भूव॒न्ननु॑धूपितासो ह॒त्वी तेषा॒मा भ॑रा नो॒ वसू॑नि॥

अ॒स्माके॑भिः । सत्व॑ऽभिः । शू॒र॒ । शूरैः॑ । वी॒र्या॑ । कृ॒धि॒ । यानि॑ । ते॒ । कर्त्वा॑नि । ज्योक् । अ॒भू॒व॒न् । अनु॑ऽधूपितासः । ह॒त्वी । तेषा॑म् । आ । भ॒र॒ । नः॒ । वसू॑नि ॥

Mantra without Swara
अस्माकेभिः सत्वभिः शूर शूरैर्वीर्या कृधि यानि ते कर्त्वानि। ज्योगभूवन्ननुधूपितासो हत्वी तेषामा भरा नो वसूनि॥

अस्माकेभिः। सत्वऽभिः। शूर। शूरैः। वीर्या। कृधि। यानि। ते। कर्त्वानि। ज्योक्। अभूवन्। अनुऽधूपितासः। हत्वी। तेषाम्। आ। भर। नः। वसूनि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) दुष्टों को मारनेहारे वीरजन (यानि) जो (वीर्य्या) वीर पुरुषों के लिये हितकारी धन (ते) आपके (ज्योक्) निरन्तर (कर्त्त्वानि) करने योग्य हैं उनको (अस्माकेभिः) हमारे सम्बन्धी (सत्वभिः) शरीरधारी प्राणी (शूरैः) निर्भय पुरुषों के साथ आप (कृधि) कीजिये। जो (अनुधूपितासः) अनुकूल गन्धों से संस्कार किये हुए (अभूवन्) होवें उनकी रक्षाकर दुष्टों को (हत्वी) मारके (तेषाम्) उनके और (नः) हमारे (वसूनि) उत्तम द्रव्यों को आप (आ,भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥१०॥
Essence
जब राजाओं में युद्ध प्रवृत्त हो प्रजास्थ मनुष्य उनके प्रति ऐसे कहें कि तुम डरो नहीं, जितने हमलोग हैं, वे सब तुम्हारे सहायक हैं, जो ऐसे आप हम आपस में एक-दूसरे से सहायक न हों तो विजय कहाँ से होवे? ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।