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Rigveda Mandal 2 / Sukta 30 / Mantra 1

43 Sukta
11 Mantra
2/30/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऋ॒तं दे॒वाय॑ कृण्व॒ते स॑वि॒त्र इन्द्रा॑याहि॒घ्ने न र॑मन्त॒ आपः॑। अह॑रहर्यात्य॒क्तुर॒पां किया॒त्या प्र॑थ॒मः सर्ग॑ आसाम्॥

ऋ॒तम् । दे॒वाय॑ । कृ॒ण्व॒ते । स॒वि॒त्रे । इन्द्रा॑य । अ॒हि॒ऽघ्ने । न । र॒म॒न्ते॒ । आपः॑ । अहः॑ऽअहः । या॒ति॒ । अ॒क्तुः । अ॒पाम् । किय॑ति । आ । प्र॒थ॒मः । सर्गः॑ । आ॒सा॒म् ॥

Mantra without Swara
ऋतं देवाय कृण्वते सवित्र इन्द्रायाहिघ्ने न रमन्त आपः। अहरहर्यात्यक्तुरपां कियात्या प्रथमः सर्ग आसाम्॥

ऋतम्। देवाय। कृण्वते। सवित्रे। इन्द्राय। अहिऽघ्ने। न। रमन्ते। आपः। अहःऽअहः। याति। अक्तुः। अपाम्। कियति। आ। प्रथमः। सर्गः। आसाम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 12 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो तुमको (तम्) जल को उत्पन्न (कृण्वते) करते हुए (सवित्रे) समस्त रसों के उत्पादक (अहिघ्ने) मेघ को काटने सूक्ष्मकर गिरानेहारे (इन्द्राय) उत्तम ऐश्वर्य के हेतु (देवाय) उत्तम गुणयुक्त सूर्य के लिये जो (अहरहः) प्रतिदिन (आपः) जल (न,रमन्ते) नहीं रमण करते अर्थात् सूर्य के आश्रय नहीं ठहरते (आसाम्) इन (अपाम्) जलों की (प्रथमः) पहली (सर्गः) उत्पत्ति (अक्तुः) प्रकटकर्त्ता सूर्य के सम्बन्ध से (कियति) कितने ही अवकाश में (आ,याति) अच्छे प्रकार प्राप्त होती है, उसको तुम जानो ॥१॥
Essence
जैसे अन्तरिक्षस्थ वायु में जल ठहरता है, वैसे सूर्य में नहीं ठहरता, सूर्यमण्डल से ही वर्षा द्वारा जल की प्रकटता होती है और यही सूर्य जल को ऊपर खींचता और वर्षाता है। जल की प्रथम सृष्टि अग्नि से ही होती है, ऐसा जानना चाहिये ॥१॥
Subject
अब तीसवें सूक्त का आरम्भ है , इसके प्रथम मन्त्र में वायु और सूर्य का विषय कहते हैं।

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