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Rigveda Mandal 2 / Sukta 3 / Mantra 11

43 Sukta
11 Mantra
2/3/11
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
घृ॒तं मि॑मिक्षे घृ॒तम॑स्य॒ योनि॑र्घृ॒ते श्रि॒तो घृ॒तम्व॑स्य॒ धाम॑। अ॒नु॒ष्व॒धमा व॑ह मा॒दय॑स्व॒ स्वाहा॑कृतं वृषभ वक्षि ह॒व्यम्॥

घृ॒तम् । मि॒मि॒क्षे॒ । घृ॒तम् । अ॒स्य॒ । योनिः॑ । घृ॒ते । श्रि॒तः । घृ॒तम् । ऊँ॒ इति॑ । अ॒स्य॒ । धाम॑ । अ॒नु॒ऽस्व॒धम् । आ । व॒ह॒ । मा॒दय॑स्व । स्वाहा॑ऽकृतम् । वृ॒ष॒भ॒ । व॒क्षि॒ । ह॒व्यम् ॥

Mantra without Swara
घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम। अनुष्वधमा वह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्॥

घृतम्। मिमिक्षे। घृतम्। अस्य। योनिः। घृते। श्रितः। घृतम्। ऊँ इति। अस्य। धाम। अनुऽस्वधम्। आ। वह। मादयस्व। स्वाहाऽकृतम्। वृषभ। वक्षि। हव्यम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषभ) श्रेष्ठजन ! जो आप (स्वाहाकृतम्) उत्तम क्रिया से उत्पन्न किये हुए (हव्यम्) ग्रहण करने के योग्य पदार्थ को (वक्षि) प्राप्त करते हो सो आप (अनुष्वधम्) अन्न के अनुकूल व्यञ्जन द्रव्य को (आवह) सब प्रकार से प्राप्त कीजिये। जैसे मैं (घृतम्) घी को (मिमिक्षे) सींचने की इच्छा करता हूँ वैसे आप सींचने की इच्छा करो। जैसे (अस्य) इस अग्नि का (घृतम्) प्रदीप्त होने का घृत (योनिः) कारण है, (घृते) घी में (श्रितः) सेवन किया जाता (घृतम्) तेज (उ) ही (अस्य) इस अग्नि का (धाम) आधार है, वैसे उससे आप (मादयस्व) आनन्दित हूजिये ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य यज्ञ में अग्नि जैसे वैसे उपकार करनेवाले परोपकार का आश्रय किये हुए औरों को सुखी करते हैं, वैसे आप भी उनसे उपकार को प्राप्त और आनन्दित होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में अग्नि विद्वान् और स्त्रीपुरुषों के आचरण का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥ यह दूसरे मण्डल में तीसरा सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।