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Rigveda Mandal 2 / Sukta 3 / Mantra 10

43 Sukta
11 Mantra
2/3/10
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वन॒स्पति॑रवसृ॒जन्नुप॑ स्थाद॒ग्निर्ह॒विः सू॑दयाति॒ प्र धी॒भिः। त्रिधा॒ सम॑क्तं नयतु प्रजा॒नन्दे॒वेभ्यो॒ दैव्यः॑ शमि॒तोप॑ ह॒व्यम्॥

वन॒स्पतिः॑ । अ॒व॒ऽसृ॒जन् । उप॑ । स्था॒त् । अ॒ग्निः । ह॒विः । सू॒द॒या॒ति॒ । प्र । धी॒भिः । त्रिधा॑ । सम्ऽअ॑क्तम् । न॒य॒तु॒ । प्र॒ऽजा॒नन् । दे॒वेभ्यः॒ । दैव्यः॑ । श॒मि॒ता । उप॑ । ह॒व्यम् ॥

Mantra without Swara
वनस्पतिरवसृजन्नुप स्थादग्निर्हविः सूदयाति प्र धीभिः। त्रिधा समक्तं नयतु प्रजानन्देवेभ्यो दैव्यः शमितोप हव्यम्॥

वनस्पतिः। अवऽसृजन्। उप। स्थात्। अग्निः। हविः। सूदयाति। प्र। धीभिः। त्रिधा। सम्ऽअक्तम्। नयतु। प्रऽजानन्। देवेभ्यः। दैव्यः। शमिता। उप। हव्यम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 23 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! जैसे (धीभिः) कर्मों के साथ वर्त्तमान (वनस्पतिः) वरगद आदि (अवसृजन्) फलादिकों का त्याग करता हुआ (उपस्थात्) उपस्थित होता है वा (अग्निः) अग्नि (त्रिधा) तीन प्रकार के (समक्तम्) समूह को प्राप्त हुए (हविः) होमने योग्य द्रव्य को (सूदयाति) प्राणिमात्र के सुख के लिये कण-कण करके पहुँचाता है, वैसे (शमिता) शान्ति करनेवाला (दैव्यः) विद्वानों में प्राप्त हुए (प्रजानन्) उत्तम ज्ञान को प्राप्त होते हुए आप (देवेभ्यः) दिव्य गुणों के लिये (उपहव्यम्) समीप में ग्रहण करने योग्य पदार्थ को (प्रनयतु) प्राप्त कीजिये ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वनस्पति और अग्नि अपने कर्मों से समस्त प्राणियों का उपकार करते हैं, वैसे विद्वान् जन अध्ययन-अध्यापन और उपदेश से सबका उपकार करें ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।