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Rigveda Mandal 2 / Sukta 3 / Mantra 1

43 Sukta
11 Mantra
2/3/1
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
समि॑द्धो अ॒ग्निर्निहि॑तः पृथि॒व्यां प्र॒त्यङ् विश्वा॑नि॒ भुव॑नान्यस्थात्। होता॑ पाव॒कः प्र॒दिवः॑ सुमे॒धा दे॒वो दे॒वान्य॑जत्व॒ग्निरर्ह॑न्॥

सम्ऽइ॑द्धः । अ॒ग्निः । निऽहि॑तः । पृ॒थि॒व्याम् । प्र॒त्यङ् । विश्वा॑नि । भुव॑नानि । अ॒स्था॒त् । होता॑ । पा॒व॒कः । प्र॒ऽदिवः॑ । सु॒ऽमे॒धाः । दे॒वः । दे॒वान् । य॒ज॒तु॒ । अ॒ग्निः । अर्ह॑न् ॥

Mantra without Swara
समिद्धो अग्निर्निहितः पृथिव्यां प्रत्यङ् विश्वानि भुवनान्यस्थात्। होता पावकः प्रदिवः सुमेधा देवो देवान्यजत्वग्निरर्हन्॥

सम्ऽइद्धः। अग्निः। निऽहितः। पृथिव्याम्। प्रत्यङ्। विश्वानि। भुवनानि। अस्थात्। होता। पावकः। प्रऽदिवः। सुऽमेधाः। देवः। देवान्। यजतु। अग्निः। अर्हन्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 22 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (सुमेधाः) शोभन मेधा बुद्धि जिसकी वह (देवः) दिव्य विद्वान् (देवान्) विद्वानों को (यजतु) प्राप्त हो वैसे (होता) सर्व पदार्थों का ग्रहण करनेवाला (पावकः) पवित्र करनेवाला (अर्हन्) योग्यता को प्राप्त हुआ (अग्निः) अग्नि भी है जैसे (पृथिव्याम्) पृथिवी में (निहितः) रक्खा हुआ (समिद्धः) अच्छे प्रकार प्रदीप्त (प्रत्यङ्) प्रत्येक पदार्थों को प्राप्त होनेवाला (अग्निः) अग्नि (विश्वानि) सब (भुवनानि) भूगोलों को (अस्थात्) निरन्तर स्थिर होता है। वैसा (प्रदिवः) जिसकी उत्तम विद्या प्रकाशित है, वह विद्वान् हो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि इस संसार में ईश्वर अग्नि को न रचे तो कोई प्राणी सुख को न प्राप्त हो सके। जैसे विद्वान् विद्वानों का सत्कार करें, वैसे अन्यलोग भी विद्वानों का सत्कार करें ॥१॥
Subject
अब ग्यारह चावाले तीसरे सूक्त का प्रारम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में अग्नि का वर्णन किया है।