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Rigveda Mandal 2 / Sukta 29 / Mantra 7

43 Sukta
7 Mantra
2/29/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
माहं म॒घोनो॑ वरुण प्रि॒यस्य॑ भूरि॒दाव्न॒ आ वि॑दं॒ शून॑मा॒पेः। मा रा॒यो रा॑जन्त्सु॒यमा॒दव॑ स्थां बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

मा । अ॒हम् । म॒घोनः । व॒रु॒ण॒ । प्रि॒यस्य॑ । भू॒रि॒ऽदाव्नः॑ । आ । वि॒द॒म् । शून॑म् । आ॒पेः । मा । रा॒यः । रा॒जन् । सु॒ऽयमा॑त् । अव॑ । स्था॒म् । बृ॒हत् । व॒दे॒म॒ । वि॒दथे॑ । सु॒ऽवीराः॑ ॥

Mantra without Swara
माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः। मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः॥

मा। अहम्। मघोनः। वरुण। प्रियस्य। भूरिऽदाव्नः। आ। विदम्। शूनम्। आपेः। मा। रायः। राजन्। सुऽयमात्। अव। स्थाम्। बृहत्। वदेम। विदथे। सुऽवीराः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 11 Mantra » 7

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Meaning
हे (वरुण) श्रेष्ठ विद्वान्! जैसे (अहम्) मैं (प्रियस्य) कामना के योग्य (भूरिदाव्नः) बहुत दान के दाता (आपेः) प्राप्त होते हुए (मघोनः) प्रशंसित धनवाले पुरुष के (शूनम्) सुख को (आ,विदम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होऊँ जिससे दुःख को (मा) न प्राप्त हों वे (राजन्) राजन् सभापते! जैसे मैं (सुयमात्) सुन्दर यम-नियम के साधक (रायः) धनसे (अव,स्थाम्) अवस्थित होऊँ जिससे दरिद्रता को (मा) न प्राप्त होऊँ जिससे मिलकर (सुवीराः) सुन्दर वीर पुरुषोंवाले हमलोग (विदथे) युद्धादि में (बृहत्) बहुत बलपूर्वक (वदेम) कहें ॥७॥
Essence
विद्वान् और सभापति आदि राजपुरुषों को योग्य है कि उन धर्मसम्बन्धी कार्यों को करें, जिनसे दुःख और दरिद्रता प्राप्त न हों और आपस में मिलके सुन्दर वीरोंवाली प्रजाओं को करें ॥७॥ इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये ॥ यह उन्तीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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