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Rigveda Mandal 2 / Sukta 29 / Mantra 4

43 Sukta
7 Mantra
2/29/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ह॒ये दे॑वा यू॒यमिदा॒पयः॑ स्थ॒ ते मृ॑ळत॒ नाध॑मानाय॒ मह्य॑म्। मा वो॒ रथो॑ मध्यम॒वाळृ॒ते भू॒न्मा यु॒ष्माव॑त्स्वा॒पिषु॑ श्रमिष्म॥

ह॒ये । दे॒वाः॒ । यू॒यम् । इत् । आ॒पयः॑ । स्थ॒ । ते । मृ॒ळ॒त॒ । नाध॑मानाय । मह्य॑म् । मा । वः॒ । रथः॑ । म॒ध्य॒म॒ऽवाट् । ऋ॒ते । भू॒त् । मा । यु॒ष्माव॑त्ऽसु । आ॒पिषु॑ । श्र॒मि॒ष्म॒ ॥

Mantra without Swara
हये देवा यूयमिदापयः स्थ ते मृळत नाधमानाय मह्यम्। मा वो रथो मध्यमवाळृते भून्मा युष्मावत्स्वापिषु श्रमिष्म॥

हये। देवाः। यूयम्। इत्। आपयः। स्थ। ते। मृळत। नाधमानाय। मह्यम्। मा। वः। रथः। मध्यमऽवाट्। ऋते। भूत्। मा। युष्मावत्ऽसु। आपिषु। श्रमिष्म॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(हये) हे (देवाः) विद्वानो जो (यूयम्) तुम लोग (इत्) ही (आपयः) सकलशुभगुणव्यापि (स्थ) होओ (ते) वे (नाधमानाय) माँगते हुए (मह्यम्) मेरे लिये (मृळत) सुखी करो जो (वः) तुम्हारा (मध्यमवाट्) पृथिवी के पदार्थों को इधर-उधर पहुँचानेवाला (रथः) विमान आदि यान (ते) जलरूप समुद्रादि में चलाता है, वह नष्ट (मा,भूत्) न हो। ऐसे (युष्मावत्सु) तुम्हारे सदृश (आपिषु) विद्यादि गुणों से व्याप्त सज्जनों में विद्या प्राप्ति के अर्थ हम लोग (श्रमिष्म) परिश्रम करें । यह हमारा श्रम नष्ट (मा) न होवे ॥४॥
Essence
सब मनुष्यों को योग्य है कि विद्याओं को प्राप्त होके सबको सुखी करें और जैसे दृढ़ पुष्ट यान बनें, वैसा प्रयत्न करें, सदा विद्वानों में प्रीति रखके विद्या की उन्नति किया करें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।