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Rigveda Mandal 2 / Sukta 29 / Mantra 1

43 Sukta
7 Mantra
2/29/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
धृत॑व्रता॒ आदि॑त्या॒ इषि॑रा आ॒रे मत्क॑र्त रह॒सूरि॒वागः॑। शृ॒ण्व॒तो वो॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ देवा॑ भ॒द्रस्य॑ वि॒द्वाँ अव॑से हुवे वः॥

धृत॑ऽव्रताः । आदि॑त्याः । इषि॑राः । आ॒रे । मत् । क॒र्त॒ । र॒ह॒सूःऽइ॑व । आगः॑ । शृ॒ण्व॒तः । वः॒ । वरु॑ण । मित्र॑ । देवाः॑ । भ॒द्रस्य॑ । वि॒द्वान् । अव॑से । हु॒वे॒ । वः॒ ॥

Mantra without Swara
धृतव्रता आदित्या इषिरा आरे मत्कर्त रहसूरिवागः। शृण्वतो वो वरुण मित्र देवा भद्रस्य विद्वाँ अवसे हुवे वः॥

धृतऽव्रताः। आदित्याः। इषिराः। आरे। मत्। कर्त। रहसूःऽइव। आगः। शृण्वतः। वः। वरुण। मित्र। देवाः। भद्रस्य। विद्वान्। अवसे। हुवे। वः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 7 Varga » 11 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (आदित्याः) सूर्य्य के तुल्य विद्या के प्रकाशक (इषिराः) ज्ञानयुक्त (धृतव्रताः) नियमों को धारण किए हुए (देवाः) विद्वान् लोगो ! तुम (मत्) मेरे (आरे) दूर वा समीप में सत्य को प्रवृत्त (कर्त्त) करो (रहसूरिव) एकान्त में जननेवाली व्यभिचारिणी के तुल्य (आगः) अपराध को मत करो (विद्वान्) विद्वान् मैं (शृण्वतः) सुनते हुए (वः) आपको (अवसे) रक्षा आदि के लिये (हुवे) बुलाता हूँ (वः) तुम लोगों के अपराध को मैं नष्ट करूँ। हे (वरुण) सर्वोत्तम (मित्र) मित्र ! आप (भद्रस्य) कल्याण की रक्षा के लिये प्रवृत्त हों ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो धर्माचरण करनेवाले अधर्म से पृथक् सबको रखने में प्रवर्त्तमान हैं, वे कल्याण को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Subject
अब उन्तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं।